पारसनाथ में सड़क पर वन्यजीव कानून की ‘ब्रेक’, केंद्र की मंजूरी के बिना नहीं बनेगा रास्ता 

पारसनाथ में सड़क पर वन्यजीव कानून की ‘ब्रेक’, केंद्र की मंजूरी के बिना नहीं बनेगा रास्ता

राजनीति नहीं, केंद्र-राज्य के समन्वय से निकलेगा समाधान

दिलीप सिन्हा, राजनीतिक संवाददाता, देवभूमि झारखंड न्यूज, गिरिडीह : पारसनाथ पहाड़ पर बसे एक गांव का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें यह दिखाया जा रहा है कि सड़क नहीं रहने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी। गांव वाले महिला मरीज को खटिया पर लादकर करीब चार किमी तक ले गए, फिर वहां से एंबुलेंस से सदर अस्पताल गिरिडीह पहुंचाया गया। यह मामला उत्तरी पारसनाथ के डलवाडीह गांव का है।

दरअसल, पारसनाथ पहाड़ पर कुरूवाटांड़ से पीपराडीह तक सड़क नहीं है। इस गांव के सड़क से नहीं जुड़ने को लेकर भाजपा समर्थक झामुमो पर निशाना साधते हैं। कारण, यह क्षेत्र झामुमो के कब्जे वाले गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। यहां के विधायक झामुमो के वरिष्ठ नेता और राज्य सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू हैं।

वहीं झामुमो समर्थकों का कहना है कि पहाड़ पर बसे गांवों की ऐसी स्थिति सिर्फ पारसनाथ में नहीं है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री व वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के विधानसभा क्षेत्र राजधनवार में भी यही स्थिति है। बाबबूलाल के विधानसभा क्षेत्र के गावां और तिसरी में सड़क नहीं रहने के कारण पूर्व में दो आदिवासी महिलाओं की मौत हो चुकी है।

बहरहाल, इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच देवभूमि झारखंड न्यूज ने पड़ताल की तो यह तथ्य उभरकर सामने आया कि पारसनाथ पहाड़ पर बसे आदिवासी गांवों को सड़क से जोड़ने में राज्य सरकार से अधिक केंद्र सरकार की भूमिका हो सकती है। आरोप-प्रत्यारोप के बजाय यदि केंद्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधि तथा यहां के जनप्रतिनिधि समन्वय के साथ आगे बढ़ें, तो रास्ता निकल सकता है।

इस कारण केंद्र सरकार निभा सकती है बड़ी भूमिका

पारसनाथ पहाड़ पर बसे गांवों को सड़क से जोड़ना आसान नहीं है। इसमें राज्य सरकार से अधिक केंद्र सरकार की भूमिका है। कारण, पारसनाथ पहाड़ को वर्ष 1984 से वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा प्राप्त है। मधुबन तलहटी से लगभग पांच सौ मीटर ऊपर चढ़ते ही अभयारण्य क्षेत्र शुरू हो जाता है। इस कारण वहां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधान लागू होते हैं।

इसी वजह से वहां पक्की सड़क का निर्माण सामान्य तौर पर प्रतिबंधित है। राज्य के मंत्री व स्थानीय विधायक सुदिव्य कुमार सोनू ने काफी प्रयास कर वन विभाग से वहां पेवर ब्लॉक बिछवाया था, लेकिन पक्की सड़क का निर्माण संभव नहीं हो सका।

क्यों अटका है सड़क निर्माण?

मुख्य कारण

1984 से वन्यजीव अभयारण्य — पारसनाथ संरक्षित क्षेत्र में शामिल

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू

पक्की सड़क पर सामान्य प्रतिबंध

केवल पेवर ब्लॉक बिछाने की सीमित अनुमति मिल सकी

किसकी अनुमति जरूरी?

वन भूमि के उपयोग में परिवर्तन के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है। साथ ही राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्लूएल) सहित अन्य सक्षम प्राधिकरणों की स्वीकृति तथा पर्यावरणीय प्रभाव का विस्तृत आकलन भी जरूरी होता है।

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सेंचुरी क्षेत्र में पक्की सड़क निर्माण की अंतिम अनुमति राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ही दे सकता है। इसके लिए डिवीजन स्तर से प्रस्ताव बनाकर भेजना पड़ता है। कुल मिलाकर यह प्रक्रिया बेहद जटिल मानी जाती है।

ऐसे में एक-दूसरे पर राजनीतिक निशाना साधने के बजाय यदि भाजपा और झामुमो के दिग्गज नेता मिलकर पहल करें, तो पहाड़ पर बसे आदिवासियों के लिए सड़क निर्माण का रास्ता खुल सकता है।

पीरटांड़ में बिछा है सड़कों का जाल

कभी अति नक्सल प्रभावित रहे पीरटांड़ में ऐसा नहीं है कि सड़कें नहीं बनी हैं। यहां सड़कों का व्यापक जाल बिछ चुका है। धनबाद जिले से टुंडी, राजगंज, बरवाअड्डा और तोपचांची होते हुए सीधे पीरटांड़ प्रखंड मुख्यालय तथा मधुबन तक पहुंचा जा सकता है।

खुखरा, हरलाडीह जैसे कई पिछड़े इलाकों को भी सड़कों से जोड़ दिया गया है। अब पीरटांड़ के सुदूर गांवों के लोग अपने घरों से आसानी से गिरिडीह, धनबाद, टुंडी और तोपचांची आ-जा रहे हैं। क्षेत्र का नजारा पहले की तुलना में काफी बदला हुआ दिखाई देता है।

सड़क निर्माण की प्रक्रिया

सेंचुरी क्षेत्र में सड़क की अनुमति कैसे मिलती है?

कानूनी प्रक्रिया

डिवीजन स्तर पर प्रस्ताव तैयार

राज्य वन विभाग से अनुशंसा

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्वीकृति

केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी

इसके बाद ही निर्माण संभव

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