हिन्दी दिवस पर विशेष
आज पुनः हिन्दी दिवस है। सुबह के अखबार से लेकर रात के टेलीविजन की अंतिम बुलेटिन तक आपको चीख़- चीख़ कर बताया जाएगा कि बस आज हिन्दी दिवस है। कुछ बधाइयाँ देंगे, कुछ शुभकामनाएँ और कुछ अपनी रचनाओं से मानो हिन्दी के लिए शांति पाठ भी कर देंगे।
मुझे वर्षों पहले की घटना याद आती है। तब मैं रेल नगरी में रहता था। सितंबर की शुरुआत के साथ केंद्रीय राजभाषा भवन की रंगाई -पुताई शुरू हो जाती।…..एक यही भवन मात्र हिन्दी का अपना था क्योंकि शेष पर तो अंग्रेजी का कब्जा था।….14 सितंबर को भवन फूलों से चौदहवीं की चाँद की तरह सजाया जाता था। दिवस हिन्दी का होता पर कार्यक्रमों की शुरुआत दिन के उत्तरार्द्ध अपराह्न में ही हुआ करती थी। पदाधिकारी अपने दैनिक कामों से फुर्सत निकालकर अंत में आते थे और हिन्दी से अधिक अपना गुणधर्म बचवाते थे। उपस्थित लोग हिन्दी से अधिक उनका धन्यवाद ज्ञापन कर अपने भाग्य पर इतराते थे।
अजी, कार्यक्रम क्या होता था बस समझ लीजिए ढकोसलों की नुमाइश थी। हिन्दी से अधिक माला और गुलदस्ते तो हाकिम और दरबारी लूट ले जाते थे। सबसे पहले दीप प्रज्ज्वलन का विधान होता। हिन्दी के नाम पर दीप में तेल भी उतने ही डाले जाते जितने में वर्तिका भींग जाए। इधर नाश्ता वितरण शुरू उधर हिन्दी की वर्तिका भी जलकर साफ। भाषण भी वैसे -वैसे स्वनाम धन्य लोग देते जिन्हे दूर -दूर तक हिन्दी से कोई वास्ता नहीं होता। ऐसा लगता आजतक जो हिन्दी है उन्ही के बल पर है और कल भी यदि जीवित होगी उनके आशीष का प्रतिफल होगा। मानो सालभर का भुला भटका राही घर लौट आया है। अब ताउम्र घर में रहकर माँ की सेवा में प्राणपन से लग जाएगा। दिल कहता अब ये पदाधिकारी सिर्फ नहीं तो थोड़ा बहुत तो जरूर हिन्दी में काम करेंगे। पर सुबह होते ही- फिर बैताल डाल पर वाली बात नजर आने लगती। दिन के साथ राजभाषा भवन के फूल सूखने लगते और धीरे -धीरे रंग रोगन भी बदरंग होने लगता और हिन्दी…..
अब ऐसे हिन्दी दिवस की क्या उपयोगिता होगी आप ही सोचें। अपनी माँ से मिलने के लिए दिन क्या तय करना?
हिन्दी आमजन की भाषा है। इसे निर्झर झरने की तरह स्वतंत्र बहने दीजिए। इसे राजभाषा होने का वार्षिक एक दिवसीय मान नहीं चाहिए। वर्ष भर का विरक्त पुत्र एकदिन माता का चरणस्पर्श करके भी क्या सुख दे पाएगा? माता को सुख आचार- व्यवहार से ही दिया जा सकता है, ढोंग और पाखंड से नहीं। अतः मैं नहीं चाहता हिन्दी महज सम्भ्रांतों की भाषा बने। मैं यह भी नहीं चाहता यह आस्था और माल्यार्पण का विषय बने। फिर वार्षिक कर्मकांड और तर्पण मार्जन क्यों करना?इसे राष्टृपति की गरिमा से सुशोभित नहीं अपितु प्रधानमंत्री की तरह कार्यशील देखना चाहता हूँ। कोई ख्वाहिश नहीं कि हिन्दी सप्तसितारा होटलों के रेस्त्रा का कीमती डेल्गोना कॉफी बने, बल्कि यह चौराहे की सोंधी कुल्हड़ चाय की तरह सुलभ हो। यह आमजन के अधरों पर बसे। यह लोगों के सुखदुख की भाषा बने। कामकाज, शिक्षा और सरोकार की भाषा बने।यह आम और खास के दरकार की भाषा बने। यह व्यवहार और व्यापार की भाषा बने। यह संस्कार और त्योहार की भाषा बने।यह समूह और समाहार की भाषा बने।यह भादो की निर्झर्णी बर्षा बने और माँ भारती का चरण वंदन और सिंचन करे। काश मेरे…..
जयंत