




स्पीड पोस्ट में विलय से बढ़ा खर्च, रजिस्टर्ड डाक सेवा को करें बहाल

डीजे न्यूज, गिरिडीह :

देश में लगभग डेढ़ सौ वर्षों से प्रचलित पारंपरिक रजिस्टर्ड डाक सेवा को समाप्त कर उसे स्पीड पोस्ट सेवा में विलय किए जाने के निर्णय पर अब सवाल उठने लगे हैं। सामाजिक एवं सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुनील कुमार खंडेलवाल ने इस मामले में भारत सरकार के संचार मंत्रालय को पत्र भेजकर इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है और इसे जनहित से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
उन्होंने कहा कि रजिस्टर्ड डाक सेवा लंबे समय से आम नागरिकों के लिए विश्वसनीय, सुरक्षित और किफायती माध्यम रही है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोग, मध्यमवर्गीय परिवार, सामाजिक संगठन तथा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत आवेदन करने वाले नागरिक इस सेवा का व्यापक रूप से उपयोग करते थे, क्योंकि इससे महत्वपूर्ण दस्तावेज कम लागत में प्रमाणिक तरीके से भेजे जा सकते थे।
खंडेलवाल ने बताया कि पहले रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजने पर लगभग 26 रुपये खर्च होते थे, जबकि अब उसी प्रकार का पत्र स्पीड पोस्ट से भेजने पर 55 से 70 रुपये या उससे अधिक खर्च करना पड़ रहा है। इससे सामान्य नागरिकों, विशेषकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई आवेदकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह महत्वपूर्ण निर्णय बिना व्यापक जनपरामर्श या सार्वजनिक चर्चा के लागू किया गया है, जिससे आम लोगों में असंतोष की भावना है। डाक सेवाओं में इस प्रकार के बड़े संरचनात्मक बदलाव से पहले व्यापक जनजागरूकता और सुझाव प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
अपने पत्र में खंडेलवाल ने मांग की है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक रजिस्टर्ड डाक सेवा को पूर्ववत पुनः प्रारंभ करने पर गंभीरता से विचार किया जाए। साथ ही इस विषय पर सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया भी अपनाई जाए ताकि आम नागरिकों की राय को महत्व मिल सके।
मामले में आवश्यक कार्रवाई के लिए खंडेलवाल के पत्र को बी.एम. पटेल, निदेशक (एमओसी पीजी), कक्ष संख्या 605, महानगर दूरसंचार भवन, नई दिल्ली के पास भेज दिया गया है। खंडेलवाल ने उम्मीद जताई है कि इस व्यापक जनहित के मुद्दे पर सरकार जल्द ही कोई सकारात्मक निर्णय लेगी।



