सात समंदर पार वैंकूवर में दिखी कोलकाता की दुर्गापूजा की झलक

सात समंदर पार वैंकूवर में दिखी कोलकाता की दुर्गापूजा की झलक

ब्रिटिश कोलंबिया में प्रवासी बंगालियों के शरदोत्सव में उमड़े 3,000 से अधिक लोग, तीसरी पीढ़ी भी निभा रही है परंपरा

डीजे न्यूज, धनबाद: दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बंगाली समाज की संस्कृति, परंपरा और भावनाओं का प्रतीक है। सात समंदर पार कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया स्थित वैंकूवर में भी दुर्गापूजा की रौनक देखने को मिली। लोअर मेनलैंड बंगाली कल्चरल सोसाइटी (एलएमबीसीएस) की ओर से आयोजित तीन दिवसीय शरदोत्सव में 3,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। मां दुर्गा की आराधना, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक व्यंजनों, खरीदारी और परिवारों के मिलन ने उत्सव स्थल को कोलकाता की दुर्गापूजा जैसा जीवंत माहौल प्रदान किया।
ब्रिटिश कोलंबिया में रहने वाले कई लोग आज भी इस संस्था को प्यार से ‘बांग्ला क्लब’ के नाम से जानते हैं। करीब पांच दशकों से यह संगठन प्रवासी बंगालियों की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक संबंधों को सहेजने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

बोधन से शुरू हुआ उत्सव, कुमारी पूजा ने मोहा मन

शरदोत्सव की शुरुआत मां दुर्गा के बोधन के साथ हुई। सप्तमी और अष्टमी की पूजा के दौरान पूजा मंडप श्रद्धालुओं और आगंतुकों से भरा रहा। भक्ति के वातावरण के बीच संगीत, नृत्य और कला से जुड़े रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उत्सव की रौनक बढ़ा दी।
इस आयोजन का सबसे भावुक और आकर्षक पहलू कुमारी पूजा में तीसरी पीढ़ी के बंगाली-कनाडाई बच्चों और उनके परिवारों की भागीदारी रही। दशकों पहले अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के उद्देश्य से एकजुट हुए प्रवासी बंगाली परिवारों की अगली पीढ़ी को भी परंपराओं को पूरे उत्साह से अपनाते देखना संस्कृति की निरंतरता का जीवंत उदाहरण बना।

बच्चों की रचनात्मकता और बुजुर्गों के अनुभवों को मिला मंच

इस वर्ष के शरदोत्सव में हर आयु वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया गया। बच्चों और किशोरों की रचनात्मक प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए ‘सिट एंड ड्रॉ’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। वहीं, वरिष्ठ सदस्यों के लिए संस्था के इतिहास और उसके लंबे सांस्कृतिक सफर पर चर्चा करने तथा अपने अनुभव साझा करने के लिए विशेष सत्र रखा गया।
इस पहल ने एक ओर नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया, तो दूसरी ओर वरिष्ठ सदस्यों की यादों, अनुभवों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर दिया। इससे विभिन्न पीढ़ियों के बीच आपसी जुड़ाव और मजबूत हुआ।

छोटी शुरुआत से बड़े सांस्कृतिक उत्सव तक का सफर

कभी कुछ बंगाली परिवारों के साथ शुरू हुई एलएमबीसीएस की दुर्गापूजा आज एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक महोत्सव का रूप ले चुकी है। शुरुआती दौर में स्वयंसेवक ही भोजन तैयार करते थे और लोगों को परोसते थे। समय के साथ इस छोटी-सी सामुदायिक पहल ने व्यापक स्वरूप हासिल कर लिया।
आज इस पूजा में ब्रिटिश कोलंबिया के विभिन्न हिस्सों के अलावा अमेरिका से भी लोग शामिल होने पहुंचते हैं। प्रवास की धरती पर आयोजित यह शरदोत्सव लोगों को कोलकाता की दुर्गापूजा की याद दिलाता है और उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहने का अवसर प्रदान करता है।

बंगाली जायके से महका उत्सव स्थल

शरदोत्सव में खानपान का आकर्षण भी देखते ही बना। विभिन्न रेस्तरां और खाद्य विक्रेताओं के स्टॉल पर एग रोल, फुचका और बिरयानी जैसे लोकप्रिय व्यंजनों की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचती रही। वहीं, अष्टमी के अवसर पर श्रद्धा के साथ परोसी गई पारंपरिक खिचड़ी, लाबड़ा, बेगुनी और चटनी ने बंगाली भोजन की परंपरा को जीवंत कर दिया।
खाने-पीने के साथ विभिन्न व्यावसायिक स्टॉल भी उत्सव का प्रमुख आकर्षण बने। साड़ियों, आभूषणों और अन्य सामान की दुकानों पर लोगों ने खरीदारी का आनंद लिया। इस तरह पूजा स्थल धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मेल-मिलाप, खानपान और खरीदारी का केंद्र भी बन गया।

दशमी पर विदाई के साथ दिखी सांस्कृतिक एकता

दशमी की पूजा और मां दुर्गा की विदाई के भावुक क्षणों में उत्सव की व्यापक सामाजिक पहचान एक बार फिर सामने आई। बंगाली समुदाय के साथ भारतीय उपमहाद्वीप की विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से जुड़े लोग भी पूजा मंडप में शामिल हुए और मां दुर्गा को भावभीनी विदाई दी।
इस आयोजन ने साबित किया कि दुर्गापूजा धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न समुदायों को जोड़ने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और आपसी सद्भाव मजबूत करने का भी सशक्त माध्यम है।
आयोजन की सफलता में इनका रहा योगदान
तीन दिवसीय शरदोत्सव को सफल बनाने में सुप्रिय भट्टाचार्य, राजेश चक्रवर्ती, सत्यक दास, जयराज सरकार, संपा कर्मकार, देवलीना मजूमदार, शैवाल चक्रवर्ती, कौशिक दास, अभिजीत गांगुली, सैकत घोषाल, शुभंकर सेन और सुजीत चटर्जी सहित अन्य सदस्यों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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