साहित्य विमर्श सम्मान–2026 से सम्मानित हुए डॉ. छोटू प्रसाद एवं विनोद आनंद

साहित्य विमर्श सम्मान–2026 से सम्मानित हुए डॉ. छोटू प्रसाद एवं विनोद आनंद

कवि गोष्ठी में गूँजी संवेदना, साहित्य और सामाजिक सरोकारों की आवाज

डीजे न्यूज,

गोविंदपुर (धनबाद) : साहित्यिक संस्था साहित्य विमर्श, धनबाद के तत्वावधान में स्थानीय मधुर मिलन सभागार में संस्थापक अध्यक्ष रामचन्द्र मिश्र की अध्यक्षता में कवि गोष्ठी सह सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में साहित्यकार डॉ. छोटू प्रसाद को उनके चर्चित उपन्यास ‘अन्तर्वेदना’ तथा साहित्यकार विनोद आनंद को उपन्यास ‘विषकन्या का प्रेम’ के लिए ‘साहित्य विमर्श सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. काशीनाथ चटर्जी तथा विशिष्ट अतिथि एस. एन. लाल त्यागी ने दोनों साहित्यकारों को शॉल, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। अतिथियों का स्वागत संजीव कुमार ने किया, जबकि संस्थापक सचिव जयंत चक्रपाणि ने सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए साहित्य विमर्श की उपलब्धियों और भावी योजनाओं की रूपरेखा रखी। कार्यक्रम का संचालन मथनचंद्र दसौंधी ने किया।

मुख्य अतिथि डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था क्षरण के दौर से गुजर रही है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को संस्कारवान बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। साहित्य के व्यापक प्रसार के लिए उन्होंने पुस्तकों के प्रचार-प्रसार, पठन-पाठन और सामूहिक वाचन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने पर बल दिया।

सम्मानित साहित्यकार डॉ. छोटू प्रसाद ने अपने उपन्यास ‘अन्तर्वेदना’ पर चर्चा करते हुए सोशल मीडिया की अपेक्षा पुस्तक-पठन की संस्कृति को अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “साहित्य ही आदमी को मानव बनाता है। साहित्य ही सभ्यता का ध्वजवाहक है।”

संस्थापक सचिव जयंत चक्रपाणि ने कहा कि साहित्य का गंभीर अनुशीलन मनुष्य को घुटन, अकेलेपन और टूटन से बचाता है। उन्होंने साहित्य विमर्श की भावी योजनाओं की जानकारी देते हुए साहित्यिक चेतना के विस्तार का आह्वान किया।

विशिष्ट अतिथि एस. एन. लाल त्यागी ने गोविंदपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय अमिताभ चक्रवर्ती द्वारा स्थापित साहित्यिक संस्था ‘निशांत’ को स्मरण करते हुए कहा कि उनके निधन के बाद क्षेत्र की साहित्यिक गतिविधियाँ कुछ मंद पड़ गई थीं, जिन्हें साहित्य विमर्श नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रहा है।

अध्यक्षीय संबोधन में रामचन्द्र मिश्र ने कहा, “जो लोग सीधे अध्यात्म की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच पाते, उनके लिए साहित्य एक सीढ़ी का कार्य करता है। साहित्य मनुष्य को संवेदनशील, संस्कारित और आत्मचिंतनशील बनाता है।”

कवि गोष्ठी में अवनिकांत झा, शीला पात्रो, संध्या रानी, शिव कुमार राय, नुसरत परवीन, सुरेश चौधरी, डॉ. सुजाता शर्मा, ज्योति कुजूर, रेणु सुजाता टोप्पो, अनंत प्रिया एवं चिंता देवी सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया।

विशेष रूप से शीला पात्रो की कविता ‘कृष्णकली’ ने अपनी कोमल संवेदना, प्रकृति-बिंबों और सौंदर्यबोध से श्रोताओं का मन मोह लिया। कविता की इन पंक्तियों को उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने विशेष सराहना दी।

“न किसी शंखध्वनि के साथ,

न किसी उत्सव की घोषणा लेकर।

वह तो बस

सावन के प्रथम मेघ की तरह

धीरे-धीरे, निःशब्द

धरती के हृदय पर उतर आई।

उसका रंग

उस सांझ की छाया था,

जहाँ दिन और रात

एक-दूसरे का हाथ थामकर

क्षण-भर के लिए

समय को रोक लेते हैं।”

कवि अवनिकांत झा की कविता ‘अहंकार’ ने पूरे सभागार को गंभीर चिंतन के लिए विवश कर दिया। संध्या रानी की कवियों की विशेषताओं पर आधारित पहेलीनुमा कविता को श्रोताओं ने खूब सराहा, जबकि नुसरत परवीन की जबलपुर क्रूज़ हादसे पर आधारित मार्मिक कविता ने उपस्थित लोगों की आँखें नम कर दीं।

कार्यक्रम का समापन साहित्य, समाज और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के संकल्प के साथ हुआ। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकारों, शिक्षकों, पाठकों एवं साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमामय बना दिया।

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