माननीयों की जंग, गैंगस्टर की मौज
मस्तराम की चौपाल
दिलीप सिन्हा
धनबाद की राजनीति में बयानबाजी ऐसी चल रही है कि लगता है माननीय एक-दूसरे की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार कर रहे हैं। सांसद ढुलू महतो और विधायक अरूप चटर्जी के बीच जुबानी जंग पराकाष्ठा पर पहुंच गई। मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी टूट गई और इस सियासी सिरफुटव्वल का सबसे बड़ा दर्शक दुबई में बैठा गैंगस्टर बन गया।
पहले विधायक अरुप को धमकी मिली, गैंगस्टर प्रिंस खान के साथ सांसद पर भी प्राथमिकी हो गई। फिर सांसद सामने आए-हमें भी धमकी मिली है, शिकायत पुलिस से कर चुके हैं। अब जनता सोच रही है कि धमकियों का यह सिलसिला ज्यादा तेज है या माननीयों की बयानबाजी? मस्तराम कहते हैं, यह कोई नई पटकथा नहीं है। जब-जब माननीय सिरफुटव्वल करते हैं, गैंगस्टर एंट्री मार मौज लेता है। सरयू बाबू के साथ बयानबाजी हो या पूर्णिमा सिंह के विधायक रहने के दौरान रागिनी सिंह को दी गई धमकी-हर बार यही पैटर्न दिखा। फर्क इतना है कि जब गैंगस्टर के गुर्गों का जेल के अंदर “इलाज” हुआ था, तब काफी दिनों तक उसकी आवाज धीमी पड़ गई थी। सो, माननीय यदि थोड़ा संयम बरतें तो गैंगस्टर को भी मुफ्त की सुर्खियां मिलनी बंद हो जाएं। खैर, फिलहाल बुलडोजर एक्शन से संतोष कीजिए साहब।
मैडम ने नहीं रघुवर ने लगाया मरहम
90 के दशक से भाजपा के जुझारू कार्यकर्ता रहे मनोज सिंह उर्फ भवानी का निधन हो गया। पूरा जीवन शुद्ध कार्यकर्ता रहे भवानी ने अपने लिए कुछ नहीं किया। सो, अपने पीछे वह अपनी जिम्मेवारियां भी छोड़ गए। भवानी के निधन के कुछ दिन बाद केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी का धनबाद दौरा हुआ। वह धनबाद के नर्सिंग होम संचालकों, व्यवसायियों से मिलीं और उन्हें मोदी सरकार की 12 साल की उपलब्धियां बताईं। लेकिन, मंत्री जी ने बीच शहर में स्थित दिवंगत भाजपा कार्यकर्ता भवानी के घर जाकर परिजनों से मिलना जरूरी नहीं समझा। इसके कुछ दिन बाद मोदी सरकार की उपलब्धियां गिनाने पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास धनबाद पहुंचे। अब संयोग देखिए, इधर रघुवर दास को जमशेदपुर से फोन आया कि उनकी बहू और विधायक पूर्णिमा दास साहू की तबीयत बिगड़ गई है। उन्हें टीएमएच में भर्ती कराया गया है। आप, जल्दी से आ जाएं। रघुवर ने कहा-वह दिवंगत पार्टी कार्यकर्ता के परिवार से मिलते हुए जमशेदपुर जाएंगे। ऐसा किया भी। उन्होंने महानगर अध्यक्ष को निर्देश दिया कि अपने सभी 20 मंडलों में वह श्रद्धांजलि सभा कर भवानी के परिवार के लिए धन जुटाएं। यह अलग बात है कि उनके निर्देशों का अब तक पालन नहीं किया है।
सरकारी संवाद में घुला खोरठा का स्वाद
झारखंड बने 25 साल हो गए, लेकिन अब जाकर सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले बड़े साहब गांव पहुंचते थे तो उनकी भाषा और जनता की भाषा के बीच अनुवादक की जरूरत पड़ जाती थी। अब साहब खुद खोरठा में संवाद कर रहे हैं। जनता के साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं। यह बदलाव लोगों को खूब भा रहा है।
धनबाद के उपायुक्त आदित्य रंजन ने जनता दरबार में कुर्सी छोड़कर खड़े-खड़े फरियाद सुनने की नई परंपरा शुरू की। तभी एक ग्रामीण महिला ने झिझकते हुए खोरठा में अपनी बात शुरू की। साहब भी उसी भाषा में जवाब देने लगे। बस, फिर क्या था! महिला का संकोच टूट गया और उसने अपनी पूरी समस्या खुलकर बता दी।
उधर, गिरिडीह में उपायुक्त रामनिवास यादव की रात्रि चौपाल में वहां की उप विकास आयुक्त स्मृता कुमारी ने भी ग्रामीणों से खोरठा में ही संवाद किया। लोग गदगद। गांव की महिलाओं ने कहा-अब बात सीधे दिल तक पहुंच रही है। मस्तराम कहते हैं-फाइलों की भाषा जनता कम समझती है, लेकिन अपनी बोली में बोले गए दो शब्द भरोसा जरूर जगा देते हैं। जनता को यही लगता है-साहब हमारे हैं, हमारी भाषा भी समझते हैं।
कुर्सी छोड़ अब चौपाल के हो गए साहब
गांव-देहात में इन दिनों एक नई चर्चा है-गिरिडीह के डीसी रामनिवास यादव का दफ्तर अब कलेक्ट्रेट तक सीमित नहीं रहा। कभी बरगद के पेड़ के नीचे, कभी खेत की मेढ़ पर, कभी रात्रि चौपाल में जमीन पर, तो कभी खटिया पर बैठकर वे लोगों की बातें सुन रहे हैं। सरकारी कुर्सी से निकलकर गांव की चौपाल तक पहुंचने वाले ऐसे नजारे रोज-रोज देखने को नहीं मिलते।
मस्तराम कहते हैं, आजकल कई अफसरों की कुर्सी इतनी आरामदायक हो गई है कि उससे उठने का मन ही नहीं करता। लेकिन यहां तो मामला उल्टा है। साहब का मन वातानुकूलित चैंबर से ज्यादा गांव की मिट्टी में रमता दिख रहा है। देवरी के लवानियां में किसानों से खेत की मेढ़ पर बैठकर संवाद हो या बरहमोरिया की रात्रि चौपाल में जमीन पर बैठकर चर्चा, हर जगह यही संदेश गया कि अफसर जनता के बीच भी हो सकता है। एसआईआर के दौरान गांडेय में खटिया पर बैठकर लोगों से बातचीत ने भी अलग तस्वीर पेश की। अब यह स्थायी कार्यशैली बनती है या नहीं, यह समय बताएगा। लेकिन जब साहब चौपाल पर बैठते हैं, तो शिकायतें भी फाइलों से निकलकर सीधे जुबान पर आ जाती हैं। आखिर गांव की असली संसद तो आज भी चौपाल ही है।