चिड़ियाघर के खिलाफ सड़कों पर उतरे दूधनिया के ग्रामीण, बोले-जान दे देंगे, पुश्तैनी जमीन नहीं छोड़ेंगे
पीरटांड़ में प्रस्तावित चिड़ियाघर का विरोध तेज, विस्थापन की आशंका से संथाल समाज में आक्रोश
डीजे न्यूज, पीरटांड़ (गिरिडीह) : पीरटांड़ प्रखंड में प्रस्तावित चिड़ियाघर के निर्माण को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। विस्थापन की आशंका से चिंतित दूधनिया गांव के सैकड़ों ग्रामीणों ने गुरुवार को जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया और चिड़ियाघर निर्माण के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि वे विकास योजनाओं के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन और गांव छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रस्तावित चिड़ियाघर को आबादी से दूर किसी दूसरे उपयुक्त स्थान पर बनाने की मांग की।
ग्रामीणों के अनुसार, चिड़ियाघर निर्माण से दूधनिया गांव के लोगों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो सकता है। इससे उनकी खेती-बाड़ी, खेत-खलिहान और आजीविका के पारंपरिक साधन प्रभावित होने की आशंका है। ग्रामीणों ने कहा कि किसी भी विकास योजना को लागू करने से पहले स्थानीय लोगों की समस्याओं, जरूरतों और भविष्य को ध्यान में रखना जरूरी है। चिड़ियाघर निर्माण के विरोध में ग्रामीणों का यह दूसरा बड़ा कदम बताया जा रहा है। इससे पहले पिछले महीने स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक कर ग्रामीणों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।
जंगल-जमीन से जुड़ा है संथाल समाज का जीवन
बताया जाता है कि कुम्हरलालो पंचायत के कठवारा में जैव विविधता पार्क का निर्माण कराया जा रहा है। इसके सामने ही चिड़ियाघर बनाने की योजना प्रस्तावित है। इस योजना को राज्य सरकार की स्वीकृति मिलने की बात कही जा रही है। वहीं, जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी की ओर से भी चिड़ियाघर निर्माण की घोषणा की जा चुकी है। हालांकि, इस योजना को लेकर आसपास के गांवों में चिंता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि संथाल समाज की परंपरा, संस्कृति और जीवनशैली जंगल तथा जमीन से गहराई से जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से लोग अपनी पुश्तैनी जमीन पर रहकर खेती-बाड़ी और अन्य पारंपरिक कार्यों के माध्यम से परिवार का भरण-पोषण करते आ रहे हैं। ऐसे में यदि उन्हें अपनी जमीन और घर छोड़ना पड़ा, तो उनके सामने केवल रोजी-रोटी का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का भी संकट खड़ा हो सकता है।
ग्रामीणों के मुताबिक, खेत-खलिहान और जमीन ही उनके जीवन का आधार हैं। चिड़ियाघर निर्माण के कारण यदि उनकी जमीन प्रभावित होती है, तो परिवारों के सामने रोजगार और आजीविका का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। इसी आशंका को लेकर ग्रामीण एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं।
विकास चाहिए, लेकिन उजड़ना मंजूर नहीं
ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि वे क्षेत्र में विकास के पक्षधर हैं। जैव विविधता पार्क और चिड़ियाघर जैसी योजनाओं से क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है तथा विकास की नई संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं। लेकिन इसके लिए स्थानीय लोगों को विस्थापन की आशंका में डालना उचित नहीं है। विकास योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को मिलना चाहिए, न कि उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने की नौबत आए।
ग्रामीणों ने बैठक में प्रस्ताव पारित कर मांग की कि प्रस्तावित चिड़ियाघर का निर्माण दूधनिया गांव और आबादी वाले क्षेत्र से दूर किसी दूसरे उपयुक्त स्थान पर कराया जाए। साथ ही, निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले ग्रामीणों की आपत्तियों, समस्याओं और संभावित विस्थापन के प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से उनकी मांगों पर संवेदनशीलता के साथ विचार करने की अपील की। उनका कहना है कि किसी भी विकास योजना को लागू करने से पहले स्थानीय लोगों के हितों और उनके भविष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि प्रस्तावित चिड़ियाघर से गांव के अस्तित्व और लोगों की आजीविका पर संकट उत्पन्न होने की आशंका है, तो इसके लिए वैकल्पिक स्थल तलाशना जरूरी है।
आंदोलन जारी रखने की चेतावनी
विरोध कार्यक्रम में पूर्व प्रमुख सिकंदर हेंब्रम, अबुन टुडू, सुभाष कुमार, जागो रजक, रविलाल, लखिराम, सोनाराम, सहदेव, अंद्रेयास, हीरालाल समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। ग्रामीणों ने कहा कि जब तक उनकी समस्याओं और विस्थापन की आशंका का उचित समाधान नहीं निकलता, तब तक वे अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते रहेंगे।