जनगणना में जाति में जनजाति और मातृ भाषा में कुड़माली दर्ज कराए कुड़मी समाज : अजीत महतो 

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जनगणना में जाति में जनजाति और मातृ भाषा में कुड़माली दर्ज कराए कुड़मी समाज : अजीत महतो

 

झारखंड आंदोलन में सबसे बड़ा योगदान पुरूलिया का लेकिन पुरूलिया को ही झारखंड में शामिल नहीं किया

डीजे न्यूज, डुमरी (गिरिडीह) : आदिवासी कुड़मी समाज डुमरी के तत्वावधान में केबी हाई स्कूल के मैदान में आयोजित दो दिवसीय सेमिनार का समापन रविवार को हो गया। मुख्य अतिथि मूल मानता मूलखूंटी मानगर अजीत प्रसाद महतो, आदिवासी कुड़मी समाज के केंद्रीय अध्यक्ष शंशाक शेखर महतो, प्रदेश अध्यक्ष बैजनाथ महतो उर्फ छोटू, दीपक पुनरियार, डॉ निरीश महतो, युवा नेता पिंटू कुमार आदि मुख्य रूप से उपस्थित हुए। इस सेमिनार में समाज के बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, युवाओं एवं महिलाओं ने भाग लिया। सेमिनार का मुख्य उद्देश्य आगामी जनगणना में आदिवासी कुड़मी समाज की पहचान, अधिकार,सामाजिक एकता, शिक्षा, संस्कृति एवं समाज के सर्वांगीण विकास पर चर्चा करना था।

इस मौके पर अजीत प्रसाद महतो ने कहा कि हमारी पहचान की लड़ाई ही झारखंड आंदोलन थी। झारखंड मुक्ति मोर्चा के जन्मदाता विनोद बिहारी महतो के साथ हमने यह लड़ाई लड़ी। उस दौर में शिबू सोरेन और एके राय जैसे नेता भी साथ थे। साइलेंट गोहान योगी छत्तीसगढ़ से भी आंदोलन में शामिल हुए थे। उन्होंने बताया कि 1983 में हम लोगों ने संविधान बनाया था। उस संविधान में कुडमि जाति और कुरमाली भाषा को शामिल करने की बात लिखी गई थी। अजीत महतो ने कहा कि झारखंड आंदोलन में सबसे ज्यादा बलिदान बंगाल के पुरुलिया क्षेत्र के लोगों ने दिया। वहां कम से कम सौ लोग शहीद हुए। आज भी कई मुकदमे लंबित हैं। आर्थिक नाकेबंदी आंदोलन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय पूरा इलाका ठप हो गया था। पुरुलिया और बंगाल में पुलिस नाकेबंदी के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ था लेकिन उपलब्धि झारखंड को मिली। साल 2000 में झारखंड अलग राज्य तो बन गया, पर कुडमि समाज को आज तक सम्मान नहीं मिला। हमारा रक्त इस माटी में गिरा है। आज भी शरीर पर गोली के दाग है। लड़ाई अभी जारी है। उन्होंने झारखंड सरकार से अपील की कि कुडमी समाज की पुरानी मांगों को मानी जाए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, यह तुम्हारे हम जैसे चाचा और बाबा-पिताजी का सपना था। शिबू सोरेन विनोद बिहारी महतो को धर्मपिता मानते थे। आज वह धर्मपिता कहां गए? सरकार को यह मांग माननी ही पड़ेगी, यही उचित है। उन्होंने कहा कि झारखंड अलग राज्य बनने की खुशी है, लेकिन जब तक कुडमि समाज सहित सभी जातियों को सम्मान नहीं मिलता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा। यह लड़ाई पहचान और सम्मान की है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष बैजनाथ महतो उर्फ छोटू ने समाज के लोगों से संगठित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने तथा शिक्षा को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान समाज की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-संस्कृति के संरक्षण, युवाओं की भागीदारी तथा सामाजिक चुनौतियों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। उपस्थित प्रतिनिधियों एवं समाज के लोगों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि आगामी जनगणना में समाज के सभी लोग अपनी जनजाति के रूप में कुड़मी तथा मातृ भाषा के रुप में कुड़माली दर्ज कराने के लिए जनजागरण अभियान चलाएंगे। वक्ताओं ने कहा कि समाज की एकता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। अपनी पहचान, भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होकर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सेमिनार में यह भी संकल्प लिया गया कि समाज के अधिकारों, शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए संगठित रूप से कार्य किया जाएगा। सेमिनार में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा किए तथा समाज के उत्थान हेतु कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में माताओं, बहनों, युवाओं एवं समाज के गणमान्य लोगों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। अंत में आयोजकों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं समाज के लोगों का आभार व्यक्त किया तथा समाजहित में ऐसे कार्यक्रम आगे भी आयोजित करने का संकल्प लिया। मौके पर पूर्व मुखिया फलजीत महतो, मेघलाल महतो, जितेन्द्र प्रसाद महतो, तालेश्वर महतो, लखी महतो, साई मनी महतो, युवा नेत्री माला महतो, टिंकू महतो, शंकर पटेल, बासुदेव महतो, सुमित महतो, झब्बू आदि दर्जनों महिला एवं पुरुष मौजूद थे।

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