कौन थे प्रशांत बोस-किसान दा से माओवादी मास्टरमाइंड तक की पूरी कहानी

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कौन थे प्रशांत बोस-किसान दा से माओवादी मास्टरमाइंड तक की पूरी कहानी

देवभूमि झारखंड न्यूज की विशेष रिपोर्ट 

प्रशांत बोस ने टुंडी-पीरटांड़ से झारखंड को बनाया था माओवाद का किला 

70 के दशक में किसान दा के नाम से पारसनाथ में थे सक्रिय, टुंडी की शीला मरांडी से किया था विवाह 

कोलकाता के यादवपुर के जमींदार घराने से जुड़े थे, अंतिम समय तक थे माओवादियों के थिंक टैंक 

शुक्रवार की सुबह रिम्स में ली अंतिम सांस, पत्नी शीला मरांडी के साथ होटवार जेल में नवंबर 2021 से थे बंद 

दिलीप सिन्हा, धनबाद : गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में ऐलान किया कि 31 मार्च को देश नक्सलवाद से मुक्त हो गया। इस घोषणा के ठीक तीन दिन बाद शुक्रवार की सुबह नक्सलियों के सबसे बड़े थिंक टैंक एवं टुंडी और पीरटांड़ से पूरे झारखंड को माओवाद का किला बनाने वाले प्रशांत बोस जिनका असली नाम प्रबल बोस था ने रिम्स रांची में अंतिम सांस ली।

शुक्रवार की सुबह तबीयत बिगड़ने पर उन्हें होटवार जेल से रिम्स ले जाया गया। जहां इलाज के दौरान कुछ ही घंटों में उन्होंने दम तोड़ दिया। वह करीब 81 साल के थे। वह होटवार जेल में अपनी पत्नी व नक्सली लीडर शीला मरांडी के साथ नवंबर 2021 से बंद थे।

प्रशांत बोस कोलकाता के यादवपुर बाबू घाट के रहने वाले थे। वह एक जमींदार परिवार से थे। नक्सली लीडर अमूल्य सेन एवं कन्हाई चटर्जी के साथ वर्ष 1970 में कोलकाता से टुंडी आकर प्रशांत बोस ने नक्सलवाद की इस क्षेत्र में नींव रखी थी। उस दौर में यहां वह किसान दा के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने टुंडी एवं गिरिडीह जिले के पीरटांड़ को एक जोन बनाकर यहां नक्सलवाद का संगठन खड़ा किया था जो बाद में पारसनाथ जोन बना। आज के सबसे बड़े नक्सली लीडर व प्रतिबंधित संगठन भाकपा माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य व एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा, टुंडी के नावाटांड़ के रहने वाले प्रयाग मांझी और पीरटांड़ के झरहा के रहने वाले पतिराम मांझी उर्फ अनल दा को संगठन से जोड़ने और आगे बढ़ाने में प्रशांत बोस का ही हाथ माना जाता है। प्रयाग मांझी और अनल दा पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। दोनों भाकपा माओवादी केंद्रीय कमेटी के सदस्य व एक-एक करोड़ रुपये के इनामी थे। प्रशांत बोस ने नावाटांड़ की रहने वाली शीला मरांडी से विवाह किया था। शीला मरांडी भाकपा माओवादी की महिला संगठन नारी मुक्ति संघ की संस्थापक अध्यक्ष थीं। जानकार बताते हैं कि प्रशांत बोस अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, संथाली, मुंडारी, हो समेत कई भाषाओं के जानकार थे। उनके भाषणों से प्रभावित होकर सैकड़ों आदिवासी युवक मुख्यधारा से हटकर नक्सलवाद की ओर मुड़ गए थे। यही कारण है कि टुंडी एवं पीरटांड़ से सबसे अधिक नक्सली कैडर निकले हैं।

यहां हम आपको बता दें कि प्रशांत बोस वर्ष 2004 में सीपीआई-एमएल (पीपुल्स वॉर) के साथ विलय होकर सीपीआई (माओवादी) बनने से पहले माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के प्रमुख थे। वे उन प्रमुख विचारकों में शामिल रहे हैं, जिन्होंने क्रांतिकारी ताकतों के पुनर्मिलन की प्रक्रिया का नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप भाकपा (माओवादी) का गठन हुआ।

प्रशांत बोस भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय समिति, पोलित ब्यूरो और केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) के सदस्य थे। वह माओवादी पार्टी के पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो (ईआरबी) के सचिव भी थे। ईआरबी सचिव के रूप में वे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में माओवादी गतिविधियों के समन्वय की उनकी जिम्मेदारी थी।

अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं, अमेरिका में रह रहे भाई से संपर्क करने की कोशिश 

प्रशांत बोस ने भले ही पूरे झारखंड में माओवाद को फैला दिया हो लेकिन अंतिम समय में स्थिति यह है कि उनका अंतिम संस्कार करने के लिए परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं है। पत्नी शीला मरांडी ने रांची प्रशासन को बताया है कि उनके एक भाई हैं जो अमेरिका में रहते हैं। उनसे संपर्क करने की कोशिश की जा सकती है। बहरहाल परिवार का कोई सदस्य नहीं है तो करीब 72 घंटे बाद प्रशासन पूरे सम्मान के साथ उनके शव का अंतिम संस्कार करेगा। बंदूक से बदलाव का रास्ता चुनने वालों में से अधिकांश का अंतिम में यही हश्र होता देखा गया है।

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