सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट, बावजूद क्यों बढ़ रही दुष्कर्म की घटनाएं
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े चिंताजनक, युवा महिलाएं सबसे अधिक शिकार
राजस्थान टॉप पर तो उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर, झारखंड भी बढ़ा रही चिंता
आलिया तहसीन, धनबाद
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने वर्ष 2024 का आंकड़ा जारी किया है। ये आंकड़े भारत में अपराध के कई चौंकाने वाली तस्वीर पेश करती हैं। महिलाओं के साथ होने वाले अपराध पर नजर डालें तो वर्ष 2005 से 2022 के दौरान देश में दुष्कर्म के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
2022 में भारत में दुष्कर्म के कुल 31 हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए। पिछले वर्ष की तुलना में दुष्कर्म के मामलों में मामूली कमी आई। हालांकि कमी की वजह ये हो सकती है कि कई बार ऐसी घटनाएं दर्ज नहीं की जाती है। फिर भी यह एक ऐसा मुद्दा है जो लगातार खबरों की सुर्खियों में बना रहता है। कुछ मामलों में तो सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन भी होते रहे हैं। हाल के वर्षों में दुष्कर्म की घटनाओं में वृद्धि हुई है, लेकिन अब भी इसे अपराधी की बजाय पीड़िता के लिए शर्मिंदगी से जोड़ा जाता है।
देश में महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन एनसीआरबी के ताजा आंकड़े एक ऐसी तस्वीर दिखा रहे हैं, जो न सिर्फ चिंताजनक हैं बल्कि कई बड़े सवाल भी खड़े करती हैं।
हर दिन… हर राज्य से… महिलाओं के साथ अपराध की खबरें सामने आती हैं।
और अब नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के डेटा ने बताया है कि देश में रेप के मामले किन राज्यों में सबसे ज्यादा दर्ज हुए।
आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा 5399 रेप केस राजस्थान में दर्ज किए गए।
यानी हर दिन औसतन 180 महिलाएं या लड़कियां इस अपराध का शिकार बनती हैं।
इस सूची में दूसरे नंबर पर है उत्तर प्रदेश, जहां 3690 मामले सामने आए।
वहीं मध्य प्रदेश में 3029 और महाराष्ट्र में 2904 केस दर्ज हुए।
हरियाणा, उड़ीसा और झारखंड जैसे राज्यों में भी मामलों की संख्या ने चिंता बढ़ा दी है।
लेकिन इन आंकड़ों का सबसे ज्यादा डराने वाले पहलू कुछ और हैं।
एनसीआरबी डेटा बताता है कि रेप पीड़ितों में सबसे बड़ा आयु वर्ग 18 से 30 साल की महिलाओं का है।
देशभर में कुल पीड़ितों में लगभग 66 प्रतिशत 18-30 वर्ष की महिलाएं सबसे ज्यादा इस अपराध का शिकार बनीं हैं यानी स्कूल या कॉलेज जाने वाली छात्राएं या नौकरी करने वाली महिलाएं इसमें शामिल हैं।
वहीं बच्चियों के साथ भी अपराध के मामले सामने आए कम नहीं हैं।
12 से 18 साल के बीच की कई नाबालिग लड़कियां भी यौन हिंसा का शिकार हुईं।
ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं बल्कि समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं।
आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक मामले उन राज्यों में दर्ज किए गए हैं जहां भाजपा या उसकी गठबंधन की सरकारें हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी या उसके गठबंधन की सरकार सत्ता में है।
वहीं झारखंड में जेएमएम गठबंधन और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है।
सवाल ये है कि आखिर इतने सख्त कानून, फास्ट ट्रैक कोर्ट और महिला सुरक्षा के दावों के बावजूद भी ऐसे अपराध रुक क्यों नहीं रहे?
क्या पुलिसिंग में कमी है?
या सामाजिक सोच अब भी बदलने को तैयार नहीं?
या फिर महिला सुरक्षा सिर्फ राजनीतिक भाषणों तक सिमट कर रह गई है?
एनसीआरबी के ये आंकड़े एक बार फिर ये सोचने पर मजबूर करते हैं कि देश में महिलाएं आखिर कितनी सुरक्षित हैं।
आज भी आसान नहीं है दुष्कर्म पीड़िता के लिए न्याय की लड़ाई
भारत में दुष्कर्म पीड़िता को न केवल सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है, बल्कि न्याय के लिए उसकी लड़ाई भी आसान नहीं होती। व्यवस्था अक्सर पीड़िता को ही उसकी बदकिस्मती के लिए दोषी ठहराती है। भारत में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां पुलिस स्टेशनों में पीड़ितों को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उन पर अक्सर अपने मामले वापस लेने का दबाव डाला जाता है। खास कर ऐसे मामले तब सामने आते हैं जब दोषी हाई प्रोफाइल फैमिली से ताल्लुक रखता है या फिर किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो। सरकार से मिली संरक्षण अपराधियों की हौसला अफजाई करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। सरपसंदों को ये मालूम है कि उन्हें सजा मिलने में दशकों लग जाएंगे और तब तक उन्हें जमानत पर बाहर आने में हुकूमत का पूरा साथ होगी।
कई बार मामला सुनवाई के लिए चला भी जाता है तो पीड़िता को इंसाफ मिलने में दशकों लग जाते हैं। विशेष रूप से दुष्कर्म के मामलों में बड़ी संख्या में मामले लंबित रहते हैं। हर साल पुराने निपटाए जाने वाले मामलों की संख्या की तुलना में नए मामलों की संख्या कहीं अधिक होती जा रही है। यह प्रक्रिया कठिन होती है। पीड़िता के जीवन में इतना आघात पहुंचा सकती है कि वे अक्सर अपने परिवार या अपराधी के परिवार के दबाव में झुक कर मामले वापस ले लेती है या आत्महत्या कर लेती हैं।
कामकाजी महिलाएं भी घरेलू हिंसा की होती हैं शिकार
भारत की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण घरेलू हिंसा को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य माना जाता है। अध्ययनों से पता चलता है कि कामकाजी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा भी अपने पतियों द्वारा घरेलू दुर्व्यवहार का शिकार होती हैं। घर चलाने वाली महिला की तुलना में, जो महिला कमाती नहीं है, उसकी स्थिति और भी अधिक असुरक्षित और अपने पुरुष साथी पर निर्भरता को बढ़ाती है। देश भर में व्याप्त गरीबी कम साक्षरता दर और परिणामस्वरूप महिलाओं के सशक्तिकरण में कमी अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का मुख्य कारण है।