चतुरानन मिश्र की हैट्रिक से सुदिव्य सोनू के दौर तक, गिरिडीह की सियासत ने बदली कई करवटें
गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र
कभी कांग्रेस-सीपीआई का था दबदबा, अब झामुमो-भाजपा के बीच सिमटी गिरिडीह की सियासत
दिलीप सिन्हा, राजनीतिक संवाददाता, देवभूमि झारखंड न्यूज, गिरिडीह : गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में पिछले करीब दो दशक से भाजपा और झामुमो के बीच मुख्य चुनावी मुकाबला होता रहा है। इस सियासी जंग में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और प्रमुख वामपंथी दल सीपीआई का नाम तक सुनाई नहीं पड़ता। राजनीति में आए नई पीढ़ी के लोगों को शायद यह मालूम भी न हो कि करीब पांच दशक तक गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में कांग्रेस और सीपीआई का दबदबा रहा था। लंबे समय तक यहां मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों दलों के बीच होता रहा।
इसी राजनीतिक संघर्ष ने देश को दो बड़े नेता दिए। कांग्रेस के केबी सहाय संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री रहे, जबकि सीपीआई के चतुरानन मिश्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव से लेकर देश के कृषि मंत्री तक रहे। चतुरानन मिश्र देश के प्रमुख मजदूर नेताओं में भी शुमार थे और एटक के राष्ट्रीय महासचिव रहे। वह लगातार तीन बार गिरिडीह के विधायक चुने गए। उनके अलावा सीपीआई के ओमीलाल आजाद भी एक बार यहां से विधायक निर्वाचित हुए। इस तरह सीपीआई ने चार और कांग्रेस ने पांच बार इस सीट पर जीत दर्ज की। रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह भी गिरिडीह के विधायक रह चुके हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नगर विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना है। सुदिव्य सोनू की पत्नी श्वेता शर्मा का झामुमो और इंडी गठबंधन की प्रत्याशी होना तय माना जा रहा है। वहीं भाजपा और जेएलकेएम में प्रत्याशी को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इस उपचुनाव के मद्देनजर हम आपको चतुरानन मिश्र की हैट्रिक से लेकर कांग्रेस के आखिरी किले तक गिरिडीह की सियासत में आए बदलावों से रूबरू करा रहे हैं।
करीब पांच दशक तक गिरिडीह विधानसभा की राजनीति में जिन दो दलों का सिक्का चलता था, आज उनकी स्थिति बदल चुकी है। सीपीआई का राजनीतिक प्रभाव यहां लगभग समाप्त हो चुका है, जबकि कांग्रेस भी लंबे समय से इस सीट पर अपना जनाधार कायम नहीं रख सकी है। स्थिति यह है कि गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का चुनाव चिह्न भी मतदाताओं के लिए पुरानी याद बनकर रह गया है। कांग्रेस ने यहां आखिरी बार 1990 में ज्योतिंद्र प्रसाद के जरिए जीत दर्ज की थी, जबकि सीपीआई के ओमीलाल आजाद 1985 में आखिरी बार विधायक बने थे। इसके बाद दोनों दल लगातार इस सीट पर पिछड़ते गए।
चंद्रमोहन प्रसाद ने भाजपा तो मुन्ना लाल ने खोला झामुमो का खाता
गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में 1995 के चुनाव में चंद्रमोहन प्रसाद ने भाजपा का खाता खोला। इसके बाद 2005 में मुन्ना लाल ने झामुमो को पहली बार इस सीट पर जीत दिलाई। इसके साथ ही गिरिडीह की सियासत का केंद्र कांग्रेस-सीपीआई से खिसककर भाजपा और झामुमो के बीच आ गया। इसके बाद के चुनावों में भी मुख्य मुकाबला इन्हीं दलों के बीच केंद्रित रहा और कांग्रेस तथा सीपीआई राजनीतिक रूप से हाशिये पर चली गईं।
1952 से 2024 तक गिरिडीह से निर्वाचित विधायक
1952 : केबी सहाय, कांग्रेस
1957 : कामाख्या नारायण सिंह, सीएनपीजीएसपीजेपी
1962 : रघुनंदन राम, कांग्रेस
1967 : रघुनंदन राम, कांग्रेस
1972 : चतुरानन मिश्र, सीपीआई
1977 : चतुरानन मिश्र, सीपीआई
1980 : उर्मिला देवी, कांग्रेस
1985 : ओमीलाल आजाद, सीपीआई
1990 : ज्योतिंद्र प्रसाद, कांग्रेस
1995 : चंद्रमोहन प्रसाद, भाजपा
2000 : चंद्रमोहन प्रसाद, भाजपा
2005 : मुन्ना लाल, झामुमो
2009 : निर्भय कुमार शाहाबादी, झाविमो
2014 : निर्भय कुमार शाहाबादी, भाजपा
2019 : सुदिव्य कुमार सोनू, झामुमो
2024 : सुदिव्य कुमार सोनू, झामुमो