भारत में मुसलमान : चुनौतियां, बदलाव, उम्मीदें और भविष्य की राह

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भारत में मुसलमान : चुनौतियां, बदलाव, उम्मीदें और भविष्य की राह

 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ मिलकर एक खूबसूरत सामाजिक ताना-बाना बनाती हैं। मुसलमान भारत की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं और उन्होंने देश की संस्कृति, साहित्य, संगीत, व्यापार, स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी एक वास्तविकता है कि देश का एक बड़ा मुस्लिम वर्ग लंबे समय से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

इन परिस्थितियों को समझने के लिए वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने सच्चर समिति का गठन किया। इस समिति की अध्यक्षता न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर ने की थी। समिति की रिपोर्ट ने पहली बार आँकड़ों और तथ्यों के आधार पर देश के मुसलमानों की वास्तविक स्थिति को सामने रखा। इस रिपोर्ट को आज भी भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति समझने का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में मुसलमानों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम थी। बड़ी संख्या में मुस्लिम बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल छोड़ देते थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मुस्लिम समुदाय के केवल लगभग 17 प्रतिशत बच्चे ही मैट्रिक तक पहुँच पाते थे। उच्च शिक्षा और प्रोफेशनल कोर्सों में उनकी भागीदारी बहुत कम थी। सरकारी नौकरियों, प्रशासनिक सेवाओं, बैंकिंग सेक्टर और सुरक्षा बलों में भी उनकी उपस्थिति आबादी के अनुपात में काफी कम पाई गई।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देश के कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। बहुत से मुस्लिम परिवार असंगठित क्षेत्र में काम करते थे, जैसे दिहाड़ी मजदूरी, छोटी दुकानें, रिक्शा चलाना, कारीगरी या घरेलू उद्योग। इन क्षेत्रों में आमदनी कम होती है और भविष्य सुरक्षित नहीं होता। आर्थिक कमजोरी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और कई बार परिवारों को कम उम्र में ही बच्चों को काम पर भेजना पड़ता है।

यदि हम आज के हालात को देखें तो तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अब बड़ी संख्या में युवा डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, पत्रकार, वकील, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देख रहे हैं। देश के कई हिस्सों से मुस्लिम लड़कियाँ भी उच्च शिक्षा की ओर आगे बढ़ रही हैं, जो एक बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव है।

सरकार द्वारा शुरू की गई विभिन्न योजनाओं ने भी कुछ हद तक मदद की है। प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति योजनाओं ने गरीब छात्रों को पढ़ाई जारी रखने का अवसर दिया। “नई मंज़िल”, “सीखो और कमाओ” तथा कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से युवाओं को रोजगार योग्य बनाने की कोशिश की गई। अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम द्वारा छोटे कारोबारों के लिए कम ब्याज पर ऋण भी उपलब्ध कराया गया।

लेकिन केवल सरकारी योजनाएँ ही किसी समाज की पूरी तस्वीर नहीं बदल सकतीं। वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब समाज स्वयं जागरूक हो और अपने भीतर सुधार की इच्छा पैदा करे। आज मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा को आंदोलन का रूप देने की है। केवल डिग्री हासिल करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, टेक्नोलॉजी, कंप्यूटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल स्किल, भाषा ज्ञान और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना होगा।

 

सामाजिक स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

 

सबसे पहले परिवारों को यह समझना होगा कि बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ी पूँजी है। शादी-ब्याह, दिखावे और अनावश्यक खर्चों पर लाखों रुपये खर्च करने के बजाय बच्चों की पढ़ाई और कौशल विकास पर निवेश करना अधिक आवश्यक है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लड़कियों की शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी जाए। आज भी कई जगहों पर लड़कियों की पढ़ाई जल्दी रुक जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि एक शिक्षित महिला पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करती है। यदि समाज वास्तव में तरक्की चाहता है तो बेटियों को उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसर देने होंगे।

तीसरी आवश्यकता सामाजिक एकता और सहयोग की है। समाज के शिक्षित और संपन्न लोगों को आगे आकर गरीब छात्रों की मदद करनी चाहिए। मोहल्लों और गाँवों में लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर, करियर गाइडेंस सेंटर और डिजिटल शिक्षा केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं। अगर हर शहर और कस्बे में कुछ लोग मिलकर दस-दस गरीब बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा लें, तो आने वाले वर्षों में बड़ी क्रांति लाई जा सकती है।

इसके अलावा धार्मिक संस्थाओं को भी समय के साथ अपनी भूमिका को और व्यापक बनाना होगा। मस्जिदों और मदरसों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, कंप्यूटर ज्ञान, भाषा प्रशिक्षण और करियर मार्गदर्शन को भी बढ़ावा देना चाहिए। धार्मिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा दोनों का संतुलन ही समाज को मजबूत बना सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू मानसिकता का है। कई बार समाज में निराशा और शिकायत का माहौल अधिक दिखाई देता है। जबकि इतिहास गवाह है कि मेहनत, अनुशासन और शिक्षा से हर मुश्किल को बदला जा सकता है। आज देश में अनेक ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ साधारण परिवारों के मुस्लिम युवाओं ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद IAS, IPS, डॉक्टर, वैज्ञानिक और बड़े उद्यमी बनकर सफलता हासिल की है। ये उदाहरण साबित करते हैं कि अवसर मिलने पर मुस्लिम समाज भी हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है।

डिजिटल युग ने भी नए अवसर पैदा किए हैं। अब केवल सरकारी नौकरी ही सफलता का रास्ता नहीं है। ऑनलाइन व्यवसाय, यूट्यूब, ई-कॉमर्स, फ्रीलांसिंग, मोबाइल रिपेयरिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, डिजिटल मार्केटिंग और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में भी अपार संभावनाएँ हैं। यदि युवा नई तकनीकों को सीखें, तो वे रोजगार खोजने वाले नहीं बल्कि रोजगार देने वाले भी बन सकते हैं।

इसके साथ-साथ समाज में आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना भी आवश्यक है। किसी भी समुदाय की तरक्की देश की तरक्की से अलग नहीं हो सकती। जब सभी समाज साथ मिलकर आगे बढ़ेंगे, तभी भारत वास्तव में मजबूत और विकसित राष्ट्र बनेगा।

आज भारत का मुसलमान एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं, लेकिन उम्मीदें भी उतनी ही मजबूत हैं। शिक्षा, आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, सामाजिक सहयोग और आधुनिक कौशल के माध्यम से आने वाला समय बेहतर बनाया जा सकता है।

जरूरत केवल इस बात की है कि शिकायतों से अधिक ध्यान समाधान पर दिया जाए, निराशा से अधिक उम्मीद को महत्व दिया जाए, और भावनाओं से अधिक शिक्षा और विकास को प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि कोई भी समाज तभी आगे बढ़ता है जब वह अपने बच्चों के हाथ में किताब, हुनर और आत्मविश्वास देता है।

 

लेखक :

शमीम अहमद

सामाजिक कार्यकर्ता

गोमो, धनबाद

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