“गुरुजी से किया वादा, गिरिडीह जीतकर निभाया ; फिर क्यों टूटा झामुमो से रिश्ता?”

“गुरुजी से किया वादा, गिरिडीह जीतकर निभाया ; फिर क्यों टूटा झामुमो से रिश्ता?”
मुन्ना लाल की जुबानी गिरिडीह में झामुमो के उदय की कहानी, गुरुजी के आशीर्वाद से मिली जीत
गिरिडीह विधानसभा उपचुनाव

दिलीप सिन्हा, राजनीतिक संवाददाता, देवभूमि झारखंड न्यूज, गिरिडीह : मेरी बहन कानपुर में रहती थी। उसकी हत्या उसके आईपीएस पति ने कर दी थी। बहन की हत्या से मैं टूट गया था। ठान लिया कि अपनी बहन के हत्यारे पति को सजा जरूर दिलाऊंगा। इस लड़ाई में मदद के लिए मैं दिशोम गुरु झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी से मिला। गुरुजी ने इसमें मेरी काफी मदद की और मैं उनका एहसानमंद हो गया। मैंने महसूस किया कि गुरुजी ही वह सच्चे इंसान हैं, जो सबकी मदद करते हैं। बस फिर क्या था, मैं उनके साथ जनता की सेवा में लग गया।

यह कहानी है उस समाजसेवी, उद्योगपति और राजनेता की, जिसने पहली बार झामुमो को गिरिडीह विधानसभा सीट पर कब्जा दिलाया था। यह समाजसेवी, उद्योगपति और राजनेता हैं मुन्ना लाल। पूर्व विधायक मुन्ना लाल ने अब राजनीति से संन्यास ले लिया है और पारिवारिक जीवन जी रहे हैं। देवभूमि झारखंड न्यूज से विशेष बातचीत में उन्होंने झामुमो से जुड़ने और झामुमो के लिए असंभव सी मानी जाने वाली गिरिडीह सीट को उसकी झोली में डालने से लेकर झामुमो से रिश्ते बिगड़ने तक की पूरी कहानी साझा की है।

गुरुजी से जुड़ने के बाद मैं लोगों की सेवा में जुट गया। एक दिन मैंने गुरुजी से कहा कि काफी कोशिश के बाद भी पार्टी गिरिडीह विधानसभा सीट पर कुछ कर नहीं पा रही है। यदि आप कहें तो मैं इसमें लगता हूं। गुरुजी ने कहा- ठीक है, लगो। मैंने कहा, ऐसे नहीं-आप मेरे सिर पर हाथ रखकर कहिए कि मेहनत करो, टिकट देंगे। गुरुजी ने ऐसा ही किया। मैंने कहा- मैं यह सीट निकालकर आपकी झोली में दूंगा। बस, मैं उसी दिन से मिशन में लग गया। जनता की सेवा करता रहा।
गुरुजी ने अपना वादा निभाया और 2005 के विधानसभा चुनाव में मुझे गिरिडीह सीट से झामुमो का टिकट दिया। सामने तत्कालीन मंत्री चंद्रमोहन प्रसाद थे। गिरिडीह से वह दो बार लगातार चुनाव जीत चुके थे और हैट्रिक मारने का दावा कर रहे थे। इधर कांग्रेस से मजदूर नेता व पूर्व विधायक ज्योतिंद्र प्रसाद और भाकपा से मजदूर नेता व पूर्व विधायक ओमीलाल आजाद मैदान में थे। राजद से निर्भय कुमार शाहाबादी थे। लड़ाई कठिन थी, लेकिन गुरुजी को दिया गया वादा पूरा करना भी जरूरी था। आखिरकार जीत झामुमो की हुई।

मैं जीतकर गुरुजी के पास गया। गुरुजी ने मुझे गले लगा लिया। पांच साल तक लगातार जनता की सेवा घर से पैसा लगाकर करता रहा। एक पैसा भी कभी किसी से कमीशन या किसी भी रूप में नहीं लिया। जगह-जगह डीप बोरिंग कराया। आज भी उसकी निगरानी रखते हैं। सभी बढ़िया से काम कर रहे हैं। कोई भी जाकर देख सकता है। गरीबों के इलाज और दवा का प्रबंध किया। डॉक्टरों से हाथ-पैर जोड़कर मामूली पैसों में गरीबों का ऑपरेशन कराया। तब आज की तरह आयुष्मान कार्ड की सुविधा नहीं थी। सेवा का फल यह मिला कि गिरिडीह विधानसभा की जनता के दिलों में मैं राज करने लगा।
अपमान मिला तो त्याग दी पार्टी, टिकट ठुकराकर निर्दलीय मैदान में उतरे
पूर्व विधायक मुन्ना लाल बताते हैं कि पार्टी में नए-नए आए लोगों ने मेरे खिलाफ पार्टी में जहर बो दिया। स्थानीय विधायक होने के बावजूद गिरिडीह शहर में होने वाले कार्यक्रमों की मुझे सूचना तक नहीं दी जाने लगी। नए लोग हावी हो गए और मुझे अपमानित किया जाने लगा। दुर्गा सोरेन के नहीं रहने से पार्टी में ऐसे लोगों की चलती हो गई। मुझे कहा गया कि व्यक्ति नहीं, पार्टी बड़ी होती है। इस कारण मैंने ठान लिया कि बता देंगे कि व्यक्ति का भी कद होता है। अपमान सहकर पार्टी में रहना मुझे मंजूर नहीं था।
ऐसे में मैंने निर्णय लिया कि अगला चुनाव 2009 का मैं झामुमो से नहीं, निर्दलीय लड़ूंगा। मैं गिरिडीह की जनता के बीच गया। मुझे कप-प्लेट चुनाव चिह्न मिला। मैंने जनता को बताया कि कैसे एक निर्दलीय विधायक जनता की सेवा और बेहतर तरीके से कर सकता है। जनता ने मुझ पर भरोसा किया।

जनता ने दिया आशीर्वाद, लेकिन भाई ने ही बिगाड़ दिया खेल
पूर्व विधायक मुन्ना लाल बताते हैं कि निर्दलीय जब मैं मैदान में उतरा था, उसके करीब एक साल पहले से ही मेरे खिलाफ मोर्चा खोल चुके थे। गिरिडीह नगर पालिका के चेयरमैन के लिए मैंने सरिता बरनवाल को उतारा था। मेरे बड़े भाई ने उसके खिलाफ वीणा मोदी को उतार दिया, ताकि मुझे विधानसभा चुनाव में इसका नुकसान हो। बिल्कुल ऐसा ही हुआ और मामूली वोटों से निर्दलीय विधायक बनते-बनते रह गया। इसके बाद मैंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। आज भी मैं जनता की सेवा करता हूं।
गुरुजी के प्रति आज भी अटूट है आस्था, गुरुजी और रूपी सोरेन के निधन से दुखी
पूर्व विधायक मुन्ना लाल का भले ही 2009 में झामुमो से मोहभंग हो गया था, लेकिन गुरुजी के प्रति उनके मन में अटूट श्रद्धा जीवन भर रहेगी। पहले गुरुजी और अब रूपी सोरेन के निधन से वह काफी दुखी हैं। वे कहते हैं कि गुरुजी के खिलाफ मैंने कभी कुछ बोलना तो छोड़िए, उनके खिलाफ कुछ सुनना भी पसंद नहीं किया।
2005 का चुनाव परिणाम
मुन्ना लाल, झामुमो : 31,895
चंद्रमोहन प्रसाद, भाजपा : 24,920
निर्भय कुमार शाहाबादी, राजद : 21,029
मनोज पांडेय, बसपा : 8,214
2009 का चुनाव परिणाम
निर्भय कुमार शाहाबादी, झाविमो : 28,771
मुन्ना लाल, निर्दलीय : 21,669
चंद्रमोहन प्रसाद, भाजपा : 18,283
विनोद कुमार, आजसू : 11,737
सुदिव्य कुमार सोने, झामुमो : 8,272

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