चार सूचना आयुक्त नियुक्त, फिर भी RTI की सुनवाई ठप; सिविल सोसाइटी ने न्यायपालिका से लगाई गुहार

चार सूचना आयुक्त नियुक्त, फिर भी RTI की सुनवाई ठप; सिविल सोसाइटी ने न्यायपालिका से लगाई गुहार

डीजे न्यूज, गिरिडीह : झारखंड में सूचना के अधिकार (RTI) की व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब छह साल तक राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली प्रभावित रहने के बाद चार नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और 1 जुलाई 2026 को उनके शपथ ग्रहण के बावजूद द्वितीय अपीलों एवं शिकायत वादों की नियमित सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। इसे लेकर सिविल सोसाइटी, गिरिडीह ने मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लिखित अभ्यावेदन देकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

सिविल सोसाइटी के महासचिव शंकर पाण्डेय ने कहा कि RTI आम नागरिक को शासन-प्रशासन से सवाल पूछने और सरकारी अभिलेखों में दर्ज सूचनाओं तक पहुंच का कानूनी अधिकार देता है। लेकिन लोक सूचना पदाधिकारी से सूचना नहीं मिलने और प्रथम अपील से राहत नहीं मिलने के बाद राज्य सूचना आयोग में दाखिल द्वितीय अपील या शिकायत पर भी वर्षों तक सुनवाई नहीं हो, तो नागरिक के सामने न्याय पाने का रास्ता ही बाधित हो जाता है।

छह साल के लंबे अंतराल के बाद राज्य सूचना आयोग में अनुज कुमार सिन्हा, तनुज खत्री, अमूल्य नीरज खलखो और शिवपूजन पाठक को सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया। चारों ने 1 जुलाई को पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। इसके बाद लोगों को उम्मीद थी कि वर्षों से लंबित RTI मामलों की सुनवाई शुरू होगी, लेकिन मुख्य सूचना आयुक्त का पद अब भी रिक्त रहने के कारण आयोग की नियमित कार्यवाही शुरू नहीं हो पाने पर सवाल उठ रहे हैं।

सूचना में छिपे हैं भ्रष्टाचार और अनियमितता के कई राज

सिविल सोसाइटी का कहना है कि RTI के तहत मांगी गई सूचना महज कागज का टुकड़ा नहीं होती। कई मामलों में इसके जरिए सरकारी योजनाओं में अनियमितता, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, अधिकारियों के फैसलों की जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। वर्षों तक अपील लंबित रहने से सूचना की उपयोगिता भी खत्म हो सकती है और इससे सिर्फ आवेदक ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को नुकसान होता है।

संगठन ने अपने अभ्यावेदन में यह भी उल्लेख किया है कि झारखंड में पूर्व में ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर तत्कालीन राज्य सूचना आयुक्त हिमांशु शेखर चौधरी को नियमित मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति तक कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी दी गई थी। ऐसे में वर्तमान परिस्थिति में कानून एवं लागू नियमों के तहत उपलब्ध विकल्पों पर तत्काल विचार करने की मांग की गई है।

सरकार से पूछे सात सवाल

सिविल सोसाइटी ने सरकार और संबंधित अधिकारियों से सवाल किया है कि चार सूचना आयुक्तों के शपथ ग्रहण के बावजूद नियमित सुनवाई क्यों शुरू नहीं हुई। मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया किस स्तर पर है और आयोग में लंबित द्वितीय अपीलों व शिकायतों की वास्तविक संख्या कितनी है। संगठन ने वर्षों से लंबित मामलों के निपटारे की समयबद्ध योजना, विशेष सुनवाई, अतिरिक्त पीठ और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था को लेकर भी जवाब मांगा है।

संगठन का सबसे बड़ा सवाल है कि कानून पर भरोसा कर RTI का इस्तेमाल करने वाले हजारों नागरिक आखिर कब तक सुनवाई का इंतजार करेंगे।

‘नागरिक ने कानून चुना, अब सरकार को जिम्मेदारी निभानी होगी’

सिविल सोसाइटी ने स्पष्ट किया कि उसका विरोध किसी व्यक्ति, अधिकारी, सरकार या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। यह लड़ाई नागरिकों के सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए है। संगठन ने कहा कि आम नागरिक के पास सत्ता या प्रशासनिक प्रभाव नहीं होता, लेकिन उसके पास सूचना का अधिकार जरूर है। यदि इस अधिकार के इस्तेमाल के बाद भी वर्षों तक सुनवाई न हो तो यह महज प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए गंभीर चुनौती है।

सिविल सोसाइटी ने न्यायपालिका से राज्य सूचना आयोग की स्थिति पर सरकार से रिपोर्ट तलब करने, मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को समयबद्ध करने, नियमित नियुक्ति तक आयोग को प्रभावी रूप से संचालित करने की कानूनसम्मत व्यवस्था करने तथा लंबित द्वितीय अपीलों और शिकायतों की तत्काल सुनवाई शुरू कराने का आग्रह किया है।

संगठन ने वर्षों से लंबित मामलों के निस्तारण के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने तथा आवश्यकता के अनुसार विशेष सुनवाई, अतिरिक्त पीठ और ऑनलाइन सुनवाई जैसी व्यवस्था लागू करने की भी मांग की है।

सिविल सोसाइटी ने कहा कि झारखंड के नागरिक लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। चार सूचना आयुक्त नियुक्त हो चुके हैं, शपथ भी ले चुके हैं और नागरिकों की अपीलें वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में अब सवाल सीधा है—सुनवाई आखिर कब शुरू होगी?

संगठन के महासचिव शंकर पाण्डेय ने कहा कि यह केवल सिविल सोसाइटी का सवाल नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का सवाल है जिसने RTI के माध्यम से शासन-प्रशासन से जवाब मांगा है। उन्होंने कहा कि “सूचना का अधिकार कागज पर नहीं, जमीन पर चाहिए। आयोग नियुक्ति से नहीं, सुनवाई से कार्यशील सिद्ध होगा

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