पति-पत्नी की जोड़ी भारी, सांसद-विधायक की सियासत बेचारी

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पति-पत्नी की जोड़ी भारी, सांसद-विधायक की सियासत बेचारी

मस्तराम की चौपाल 

दिलीप सिन्हा

इन पति-पत्नी की जोड़ी चर्चा में है। हो भी क्यों न। आठ साल बाद पति जेल से निकले और मेयर चुन लिए गए। समझ ही गए होंगे-यह जोड़ी है संजीव सिंह एवं उनकी पत्नी व विधायक रागिनी सिंह की। यह जोड़ी भाजपा के सांसद ढुलू महतो एवं विधायक राज सिन्हा को टेंशन दे रही है। दोनों को टेंशन होना लाजिमी है। ढुलू और राज सिन्हा के मोर्चा संभालने के बावजूद संजीव सिंह ने भाजपा के अग्रवाल साहब को चौथे नंबर पर धकेल दिया। सो, पति-पत्नी का जलवा है। सांसद-विधायक खेमे में मायूसी। बात यहीं नहीं खत्म होती। अब बिजली संकट के बहाने पति-पत्नी धनबाद में भी सक्रिय होने का ट्रेलर दिखा रहे हैं। इधर मस्तराम चौपाल में चेलों के जरिए मेयर को सचेत कर रहे-इतराएं नहीं। ढुलू और राज पुराने धुरंधर हैं। फील्डिंग सजाने में माहिर हैं।

बल्लेबाजी मुश्किल हो जाएगी। खैर, हम तो चुप ही रहेंगे।

अपने ही गढ़ में ‘सोनू का जाल, मरांडी जी हुए बेहाल

गिरिडीह के दो नेताओं का झारखंड की राजनीति में जलवा है। यह हैं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी एवं नगर विकास मंत्री सुदिव्य सोनू। गिरिडीह बाबूलाल मरांडी का गढ़ माना जाता है। हालांकि सुदिव्य सोनू के चमकने के बाद बाबूलाल का यह गढ़ धंस चुका है। नगर निकाय चुनाव में सोनू जी ने जो चक्रव्यूह बनाया उसमें मरांडी साहब बुरी तरह फंस गए। मरांडी जी के घर में भाजपा की भद पिट गई। भाजपा झामुमो से मेयर चुनाव तो हारी ही डिप्टी मेयर में प्रत्याशी भी नहीं दे सकी। इतना ही नहीं बाबूलाल के विधानसभा क्षेत्र धनवार में नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी भाजपा हार गई। हद तो तब हो गई जब सरिया नगर पंचायत अध्यक्ष चुने जाने के बाद शोभा देवी ने कह दिया कि उनका भाजपा से नाता नहीं है। हां, शोभा देवी का स्वागत करते मंत्रीजी जरूर नजर आए। मस्तराम ने चेताया-जमीन बचाइए बाबूलाल जी।

गुरुजी के आश्रम पर करोड़ों की चमक, सपनों के हिस्से सिर्फ झमक

टुंडी के पोखरिया का शिबू आश्रम। दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने इसी आश्रम से झारखंड आंदोलन चलाया था। गुरुजी के दिवंगत होने के बाद इस आश्रम को सरकार ऐतिहासिक स्थल बना रही है। इस पर करोड़ों रुपये खर्च होंगे। स्वाभाविक है, सरकार के सपने को पूरा करने में महकमा लग गया। गुरुजी का आश्रम ऐतिहासिक बने, यह जन भावना भी है। लेकिन गुरुजी ने जिस भावना से यहां लड़ाई लड़ी, उसका सम्मान कौन करेगा। यहां के आदिवासियों का जीवन स्तर ऊपर उठे, उन्हें चिकित्सा सुविधा मिले, यह सपना गुरुजी का था। अपने डीसी साहब ने इस आश्रम में घोषणा की थी कि टुंडी की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार होगा। डॉक्टरों की जियोटैगिंग उपस्थिति होगी। स्थिति क्या है-आश्रम के बगल के अस्पताल तक में डॉक्टर नहीं रहते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की बात ही छोड़िए। मस्तराम ने याद दिलाया-वादा भूलिएगा नहीं साहब। वादा भूलना नेताओं का काम है।

यूं ही नहीं कायम है शांति

गिरिडीह में ईद, चैती दुर्गा पूजा, छठ, सरहुल, रामनवमी सब कुछ शांतिपूर्ण संपन्न हुआ। कहीं कोई बवाल नहीं। इसके ठीक विपरीत धनबाद में रामनवमी में भारी बवाल हो गया। पहले होता यह था कि पर्व में गिरिडीह में दंगा और धनबाद में शांति। गिरिडीह में सरस्वती पूजा तक में दंगा होता रहा है। अब परिस्थितियां बदल गई है। निश्चित रूप से मौजूदा डीसी रामनिवेश यादव का इसमें बड़ा योगदान है। लेकिन यहां यूं ही नहीं शांति कायम है। इस शांति की नींव गिरिडीह के दो पूर्व डीसी उमाशंकर सिंह एवं राहुल सिन्हा ने रखी थी। मौजूदा डीसी रामनिवास यादव ने उसे और मजबूत किया। उमाशंकर सिंह ने दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की थी। बिना भेदभाव के दोनों पक्षों पर दंगा का मुकदमा कराया था। इससे दंगाइयों में खौफ पैदा हुआ। इसके बाद राहुल सिन्हा जब डीसी बने तो उन मुकदमों को उन्होंंने सरकार से मंजूरी दिलाई। नतीजा, अब कोई भी नेता उपद्रवियों को नेतृत्व देने तैयार नहीं। सो, शांति ही शांति।

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