



.. गुरुजी ने बिनोद बाबू की रिहाई के लिए घेर लिया था गिरिडीह जेल
पारसनाथ को मुक्त क्षेत्र घोषित कर गुरुजी ने बनाई थी समानांतर सरकार, बिना अनुमति के प्रशासन नहीं कर पाता था कोई कार्रवाई
झामुमो स्थापना दिवस पर विशेष


दिलीप सिन्हा, गिरिडीह : बात 1974 की है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के धर्मपिता और झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो जिन्हें गुरुजी अपना धर्मपिता कहते थे बहुचर्चित घटक दारोगा हत्याकांड में गिरिडीह जेल में बंद थे। झारखंड आंदोलन का यह वह दौर था जब शिबू सोरेन ने पारसनाथ जोन जिसके तहत गिरिडीह का पीरटांड़, डुमरी तथा धनबाद का टुंडी व तोपचांची प्रखंड आता है, को मुक्त इलाका घोषित कर दिया था। उन्होंने वहां समानांतर सरकार बना ली थी। आदिवासी बहुल इन इलाकों में शिबू की अनुमति से ही प्रशासन के लोग कार्रवाई कर पाते थे। तोपचांची थाना पुलिस ने पारसनाथ के कुछ आदिवासियों को बिना अनुमति लिए गिरफ्तार किया था। विरोध में पलमा पहाड़ी पर आदिवासियों की सभा चल रही थी। शिबू सोरेन सभा में तब तक नहीं पहुंचे थे। इस बीच पुलिस अधिकारी घटक दारोगा वहां पहुंच गए। आक्रोशित लोगों ने उनकी हत्या कर दी। दूसरे पुलिसकर्मी किसी प्रकार वहां से जान बचाकर भागे। घटक दारोगा का शव भी नहीं मिला। इस मामले में बिनोद बाबू को गिरफ्तार कर गिरिडीह जेल में बंद कर दिया गया था। सरकार विनोद बाबू को जेल से रिहा होने नहीं दे रही थी। जैसे ही जमानत मिलती उन्हें दूसरे मामले में आरोपित बना दिया जा रहा था। जब अदालत के जरिए शिबू को अपने धर्मपिता की रिहाई का रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने आंदोलन किया। जेल का ताला टूटेगा, बिनोद बिहारी छूटेगा नारे के साथ सड़क पर उतर गए। इसके लिए धनबाद, गिरिडीह, दुमका एवं हजारीबाग के अपने समर्थकों को शिबू ने गिरिडीह जेल का घेराव करने बुला लिया। दिसंबर 1974 में शिबू कीआवाज पर 20 से 25 हजार लोग तीर-धनुष, नगाड़ा व मांदर लेकर गिरिडीह जेल के समीप पीडब्ल्यूडी (सर्कस) मैदान पहुंच गए। इनकी अगुवाई शिबू कर रहे थे। इधर प्रशासन ने जेल की सुरक्षा बढ़ा दी।
शिबू का इशारा हो जाता तो जेल तोड़ देती भीड़
झारखंड आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले झामुमो के संस्थापक सदस्य धनबाद के राजगंत निवासी शंकर किशोर महतो बताते हैं कि उस समय ये हाल था कि शिबू का एक इशारा हो जाता तो भीड़ जेल तोड़ देती। शिबू ने संयम से काम लिया था। शिबू की योजना की जानकारी बिहार सरकार को पहले ही मिल चुकी थी। इस कारण बिनोद बाबू को गिरिडीह जेल से भागलपुर जेल रात में ही शिफ्ट करा दिया गया था। घंटों यह घेराव चला। उपायुक्त ने शिबू को यह जानकारी देकर किसी प्रकार घेराव समाप्त कराया। आंदोलन में शामिल रहे शंकर किशोर महतो ने बताया कि हमारी योजना जेल का ताला तोड़ने की नहीं थी। गुरुजी का कहना था कि ऐसा आंदोलन हो कि इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई पड़े। शिबू सोरेन एवं बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आंदोलन में ऐसी अनंत लड़ाई लड़ी थी। उन्हीं लड़ाइयों की देन है कि आज अलग झारखंड राज्य बना और झामुमो के नेतृत्व में मजबूत सरकार है।

गिरिडीह के झंडा मैदान में आज मनेगा स्थापना दिवस, 25 हजार लोग होंगे शामिल
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना चार फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में बिनोद बिहारी महतो, एके राय एवं शिबू सोरेन की अगुवाई में हुई थी। इस पल के गवाह झारखंड पार्टी के नेता एवं पूर्व सांसद एनई होरो भी बने थे। सभा में झामुमो के पहले अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो एवं महासचिव शिबू सोरेन बनाए गए थे। इसके कई साल बाद गिरिडीह में जब झामुमो का संगठन तैयार हुआ तो उस तिथि चार मार्च को गिरिडीह में झामुमो का स्थापना दिवस मनाया जाता है। त्योहार के कारण इस वर्ष चार मार्च के बदले 30 मार्च को स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। स्थापना दिवस समारोह के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एवं गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन होंगी। समारोह झंडा मैदान में मनाया जाएगा। करीब 25 हजार से अधिक लोगों की उपस्थिति इसमें होने की संभावना है।


