



अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस:
भारतीय चिंतन में नारी केवल समानता नहीं बल्कि सभ्यता की आत्मा है: डा. कल्याणी कबीर

डीजे न्यूज, धनबाद: रविवार को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के प्रदेश अध्यक्ष सह वरिष्ठ शिक्षाविद व साहित्यकार डा. कल्याणी कबीर ने अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया में महिलाओं के अधिकार, समानता और सशक्तिकरण की चर्चा हो रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों से लेकर राष्ट्रीय नीतियों तक, नारी की स्थिति और भूमिका पर गंभीर विमर्श चल रहा है। लेकिन इस बहस के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या हम नारी के विषय को केवल अधिकारों और अवसरों के सीमित दायरे में देख रहे हैं, या उसे उस व्यापक दृष्टि से समझ रहे हैं जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों पहले स्थापित किया था?
भारतीय चिंतन में नारी का प्रश्न केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं है, बल्कि यह सभ्यता के मूल दर्शन से जुड़ा हुआ है। यहाँ नारी को केवल व्यक्ति या नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन और संस्कार की धुरी के रूप में देखा गया है। इसलिए भारतीय परंपरा में नारी को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। यह कोई मात्र धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि यह उस सांस्कृतिक दृष्टि का प्रतिफल है जिसमें नारी को जीवन की मूल प्रेरणा माना गया है।
भारतीय शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”
अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है। यह वाक्य भारतीय समाज की मूल चेतना को प्रकट करता है। इसका अर्थ यह है कि नारी का सम्मान केवल नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक समृद्धि और संतुलन की अनिवार्य शर्त है।
यदि हम इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय सभ्यता ने नारी को ज्ञान, विचार और नेतृत्व के क्षेत्र में भी सम्मानित स्थान दिया। वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने दार्शनिक संवादों में भाग लिया और ब्रह्मविद्या पर गंभीर विमर्श किया। यह तथ्य इस धारणा को चुनौती देता है कि प्राचीन समाज में नारी केवल घरेलू भूमिका तक सीमित थी। वास्तव में भारतीय परंपरा का मूल स्वरूप कहीं अधिक उदार और संतुलित था।
भारतीय समाज में नारी की भूमिका केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर तक सीमित नहीं रही। वह समाज के संस्कार और चरित्र की निर्माणकर्ता रही है। एक माँ केवल संतान को जन्म नहीं देती, बल्कि उसे संस्कार और जीवन दृष्टि भी प्रदान करती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि माँ ही प्रथम गुरु होती है। यदि समाज के संस्कार मजबूत हैं तो उसके पीछे परिवार और विशेष रूप से महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इतिहास यह भी बताता है कि जब-जब समाज संकट में पड़ा, तब-तब महिलाओं ने असाधारण साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी इसका स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने केवल संघर्ष में भाग नहीं लिया, बल्कि समाज को जागृत करने और संगठन खड़ा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह दर्शाता है कि नारी केवल प्रेरणा का स्रोत नहीं, बल्कि परिवर्तन की शक्ति भी है।
हालाँकि यह भी सत्य है कि समय के साथ भारतीय समाज में कई प्रकार की सामाजिक विसंगतियाँ उत्पन्न हुईं। कुछ कुरीतियों और संकीर्ण मानसिकताओं के कारण महिलाओं की स्थिति कई स्थानों पर कमजोर हुई। लेकिन यह स्थिति भारतीय मूल चिंतन का प्रतिनिधित्व नहीं करती। यह उस आदर्श से विचलन का परिणाम है जिसमें नारी को शक्ति और सम्मान का प्रतीक माना गया था।
आज के समय में जब महिलाएँ शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति और उद्योग जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं, तब यह स्पष्ट हो रहा है कि अवसर मिलने पर नारी किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती है। लेकिन महिलाओं की प्रगति का प्रश्न केवल अवसरों तक सीमित नहीं है। इसके साथ-साथ समाज की मानसिकता में परिवर्तन भी आवश्यक है।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक ओर हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन दूसरी ओर उपभोक्तावादी संस्कृति में नारी की छवि को कई बार केवल आकर्षण या उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विज्ञापन, मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों में महिलाओं की गरिमा को कई बार बाजार के हितों के अनुसार ढाला जाता है। यह प्रवृत्ति केवल महिलाओं के सम्मान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के नैतिक आधार के लिए भी चुनौती है।
यदि समाज नारी को केवल बाज़ार की वस्तु के रूप में देखने लगे, तो यह उस सांस्कृतिक दृष्टि के विपरीत है जिसने नारी को शक्ति और प्रेरणा का स्रोत माना था। इसलिए आवश्यक है कि आधुनिकता के साथ-साथ हम अपनी सांस्कृतिक दृष्टि को भी जीवित रखें।
नारी सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल कानून बनाना या नीतियाँ घोषित करना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा सामाजिक वातावरण बनाना जिसमें महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और अवसर तीनों प्राप्त हों। परिवार, समाज और शासन—तीनों को मिलकर इस दिशा में कार्य करना होगा।
भारतीय चिंतन की विशेषता यह है कि वह नारी को केवल अधिकारों के संदर्भ में नहीं देखता, बल्कि उसे समाज की साझी जिम्मेदारी और शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। यहाँ नारी को शक्ति भी कहा गया है और करुणा का स्वरूप भी। वह सृजन की आधारशिला भी है और समाज के संतुलन की संरक्षिका भी।
आज भारत एक नए युग की ओर अग्रसर है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि हमारा समाज अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत बनाए। इस प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि नारी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सम्मानित होगी, तो परिवार सुदृढ़ होगा, समाज संतुलित होगा और राष्ट्र का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। लेकिन यदि नारी की गरिमा और सुरक्षा की उपेक्षा की जाएगी, तो कोई भी आर्थिक प्रगति समाज को स्थायी समृद्धि नहीं दे सकेगी।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि भारतीय चिंतन में नारी का प्रश्न केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा का प्रश्न है। नारी सम्मान और नारी सशक्तिकरण को केवल एक नीतिगत कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के मूल सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना होगा।
क्योंकि जिस समाज में नारी का सम्मान सुरक्षित होता है, वही समाज वास्तव में सभ्य, संतुलित और समृद्ध कहलाने का अधिकार रखता है।



