सतत विकास और समावेशी समाज के लिए लैंगिक समानता जरूरी : प्रो. डायना फॉक्स

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सतत विकास और समावेशी समाज के लिए लैंगिक समानता जरूरी : प्रो. डायना फॉक्स

डीजे न्यूज, धनबाद : अमेरिका के ब्रिजवाटर स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डायना फॉक्स ने कहा कि लैंगिक समानता केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं है, बल्कि सतत विकास, आर्थिक प्रगति और प्रभावी शासन की भी बुनियादी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में मौजूद लैंगिक असमानताओं को दूर करने के लिए समावेशी साझेदारी, न्यायपूर्ण नीतियां और समुदाय आधारित प्रयास जरूरी हैं।

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में सोमवार को आयोजित व्याख्यान “ब्रेकिंग बैरियर्स, बिल्डिंग इन्क्लूसिव स्पेसेस : चैलेंजेज एंड स्ट्रेटेजीज टू एड्रेस ग्लोबल जेंडर डिस्पैरिटीज थ्रू डिकोलोनियल फेमिनिस्ट पार्टनरशिप्स” में प्रो. फॉक्स ने ये बातें कहीं। कार्यक्रम का आयोजन डीन (कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस) एवं मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग की प्रोफेसर प्रो. रजनी सिंह ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो. रजनी सिंह ने अतिथि वक्ता का स्वागत करते हुए कहा कि बढ़ती असमानताओं और जटिल वैश्विक चुनौतियों के दौर में लैंगिक न्याय, समावेशन और सतत विकास जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रो. डायना फॉक्स जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता के साथ संवाद से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर मिलता है।

शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो. फॉक्स ने कहा कि जेंडर को केवल महिलाओं तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें पुरुष, ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक पहचान वाले लोग भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि जाति, वर्ग, नस्ल, धर्म, दिव्यांगता और भौगोलिक परिस्थितियां भी लैंगिक असमानताओं को प्रभावित करती हैं।

समानता (Equality) और न्यायसंगत अवसर (Equity) के बीच अंतर समझाते हुए उन्होंने कहा कि सभी को एक जैसे अवसर देना समानता है, जबकि अलग-अलग परिस्थितियों और जरूरतों को ध्यान में रखकर अवसर उपलब्ध कराना इक्विटी है। उन्होंने कहा कि असमान परिस्थितियों को दूर करने के लिए न्यायपूर्ण समाधान आवश्यक हैं।

प्रो. फॉक्स ने कहा कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए लैंगिक समानता को जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पर्यावरणीय नीतियों के साथ जोड़ना होगा। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं द्वारा संचालित पहलों के उदाहरण देते हुए बताया कि महिलाओं की भागीदारी समाज को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाती है।

उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए “प्रैक्सिस” यानी विचार और कार्रवाई के संयोजन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों, नीति निर्माताओं, उद्योग जगत और जमीनी संगठनों को समुदायों के साथ मिलकर समाधान तैयार करने होंगे।

प्रो. डायना फॉक्स सांस्कृतिक एवं अनुप्रयुक्त मानवविज्ञानी, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। वे ब्रिजवाटर स्टेट यूनिवर्सिटी में मानवविज्ञान विभाग की अध्यक्ष हैं तथा जर्नल ऑफ इंटरनेशनल विमेन्स स्टडीज की संस्थापक-संपादक भी हैं। उन्हें चार फुलब्राइट पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उनका शोध कार्य लैंगिक विविधता, महिला आंदोलन, मानवाधिकार, पारिस्थितिकीय स्थिरता और ट्रांसनेशनल फेमिनिज्म जैसे विषयों पर केंद्रित है।

व्याख्यान के बाद आयोजित संवादात्मक सत्र में प्रतिभागियों ने लैंगिक समानता, सतत विकास और समावेशी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रश्न पूछे। इस अवसर पर डॉ. सुतनुका बनर्जी, सहायक प्राध्यापक, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग, एनआईटी दुर्गापुर भी उपस्थित थीं।

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