ममता के लिए ‘खेती’ या बड़ी रणनीति? झामुमो पर बड़ा सवाल

Advertisements

ममता के लिए ‘खेती’ या बड़ी रणनीति? झामुमो पर बड़ा सवाल

वृहद झारखंड नहीं, अब आदिवासी राजनीति का नया चेहरा बनना चाहते हैं हेमंत-कल्पना

दिलीप सिन्हा, राजनीतिक संवाददाता, देवभूमि झारखंड न्यूज, धनबाद : बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारकर झामुमो ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह स्पष्ट कर दिया है कि वृहद झारखंड के निर्माण का सपना अब काफी पीछे छूट चुका है। कुल मिलाकर कहें तो झामुमो के दोनों शीर्ष नेता-मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी धर्मपत्नी व गांडेय की विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन के लिए अब प्राथमिक लक्ष्य वृहद झारखंड नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप में स्थापित होना है।

  1. इस लक्ष्य की दिशा में झामुमो तेजी से आगे बढ़ता दिख रहा है। असम विधानसभा चुनाव में पार्टी की सक्रिय भागीदारी इसी ओर संकेत करती है। वहीं, अपने प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले बंगाल के जंगलमहल इलाके में चुनाव नहीं लड़ना और ममता बनर्जी की पार्टी के पक्ष में हेमंत-कल्पना का जोरदार प्रचार भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विधानसभा चुनाव में सहयोगियों के साथ 56 सीटें हासिल कर झामुमो ने यह साबित कर दिया कि हेमंत सोरेन अब केवल संथालों के नेता नहीं रहे, बल्कि विभिन्न आदिवासी समुदायों—संथाल, मुंडा, हो और उरांव—के व्यापक नेता बन चुके हैं। यही कारण है कि अब उनका लक्ष्य राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप में उभरना है, जबकि वृहद झारखंड का सपना पीछे छूटता दिख रहा है।

बंगाल का जंगलमहल क्षेत्र (पुरुलिया और आसपास के जिले) कभी झामुमो का मजबूत गढ़ रहा है। यहां लगभग 30 प्रतिशत कुर्मी और 8 प्रतिशत आदिवासी मतदाता हैं। इस आधार को मजबूत करने का श्रेय झामुमो के संस्थापक बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन को जाता है। इसी सामाजिक समीकरण के दम पर झामुमो ने अतीत में यहां अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बार पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया।

हेमंत और कल्पना सोरेन ने तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में कई चुनावी सभाएं भी कीं। झारखंड के फायरब्रांड नेता व पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा का मानना है कि बंगाल में चुनाव नहीं लड़कर और असम में चुनाव लड़कर झामुमो ने रणनीतिक गलती की है। उनके अनुसार, “हेमंत-कल्पना ने अपनी ही जमीन पर ममता दीदी के लिए खेती कर दी, जिसका लाभ तृणमूल कांग्रेस को मिलेगा।” झामुमो यहां अपनी जमीन खो देगा।

वृहद झारखंड आंदोलन का इतिहास

वृहद झारखंड का आंदोलन जयपाल सिंह मुंडा के समय से शुरू हुआ था। उन्होंने झारखंड पार्टी के बैनर तले 26 जिलों को मिलाकर एक बड़े राज्य की मांग उठाई थी, जिसमें बिहार, ओडिशा, बंगाल और मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के क्षेत्र शामिल थे।

हालांकि, उनके कांग्रेस में शामिल होने के बाद यह आंदोलन धीमा पड़ गया। बाद में एनई होरो, नरेन हांसदा और बागुन सुम्ब्रई जैसे नेताओं ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

सन् 1973 में प्रसिद्ध माक्र्सवादी चिंतक कामरेड एके राय के सानिध्य में बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ, जिसने आंदोलन को नई दिशा दी। अंततः 15 नवंबर 2000 को, बिरसा मुंडा की जयंती के दिन, बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन हुआ। लेकिन राज्य बनने के बाद सत्ता की राजनीति में उलझकर झामुमो वृहद झारखंड के मूल विचार से दूर होता गया। परिणामस्वरूप बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के वे क्षेत्र, जहां कभी झामुमो का प्रभाव था, धीरे-धीरे संगठन से दूर हो गए।

  18 जिले का झारखंड बनने के साथ ही झामुमो वृहत झारखंड के सपने को ही पीछे छोड़ दिया। इसका नतीजा हुआ कि बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरूलिया जिले तथा ओडिशा के मयूरभंज, सुंदरगढ़ और क्योंझर जिले तथा छत्तीसगढ़ के सरगुजा और जसपुर जिले में जहां कभी झामुमो का सिक्क चलता था, संगठन ही मृत हो गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव रहे झारखंड आंदोलनकारी व पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने देवभूमि झारखंड न्यूज को बताया कि वृहत झारखंड के आंदोलन के ही कारण कभी ओडिशा में छह विधायक और एक सांसद झामुमो के रह चुके हैं। बंगाल में नरेन हांसदा झारखंड पार्टी से विधायक रह चुके हैं। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी वहां से झारखंड पार्टी के टिकट पर विधायक बनीं। वृहत झारखंड का मुद्​दा छोड़ने के बाद वहां के नेता एक-एक कर तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और बिजू जनता दल में शामिल होते गए। शैलेंद्र महतो ने बताया कि वृहत झारखंड में आदिवासी और कुर्मी का मजबूत गठबंधन था जो झामुमो के पक्ष में था।

हेमंत-कल्पना ने बंगाल मेंं दीदी के लिए आदिवासियों को किया गोलबंद

हेमंत-कल्पना ने बंगाल के जंगल महल इलाके में धुआंधार चुनावी सभा कर ममता बनर्जी के प्रत्याशियों के लिए आदिवासियों को गोलबंद करने की कोशिश की है।

इन क्षेत्रों में की चुनावी सभा

पश्चिमी मेदिनीपुर के केशियारी विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी रामजीबन मंडी के समर्थन में हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने संयुक्त रूप से चुनावी सभा को संबोधित किया।

दांतन विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी माणिक मैती के साथ हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने संयुक्त रूप से चुनावी सभा को संबोधित किया।

हेमंत सोरेन ने रायपुर विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित किया।

हेमंत सोरेन ने तालडांगरा में आदिवासी नेताओं एवं समाज के लोगों के साथ तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में बैठक की

हेमंत सोरेन ने झारग्राम में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित किया।

हेमंत सोरेन ने बांकुड़ा जिले के तालडांगरा विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित किया।

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial
Scroll to Top