वीडियो कॉल वाला डॉन और परेशान कप्तान साहब!

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वीडियो कॉल वाला डॉन और परेशान कप्तान साहब!

मस्तराम की चौपाल 

दिलीप सिन्हा :

कोयलांचल में अपराध की दुनिया भी हाईटेक हो गई। पहले गैंगस्टर चिट्ठी भेजते थे, अब वीडियो वायरल कर रहे हैं। भगोड़ा अपराधी प्रिंस खान कभी दुबई तो कभी पाकिस्तान से ऑनलाइन हाजिरी लगाकर डॉक्टरों, उद्यमियों और कारोबारियों को धमकाता रहा है। लेकिन इस बार तो उसने हद ही कर दी। अब सीधे कप्तान साहब को ही धमकी दे डाली। ऊपर से केंद्र सरकार से जांच कराने की मांग भी कर दी।

उधर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी वायरल वीडियो को मुद्दा बनाते हुए जांच की मांग कर दी। लेकिन जनता इस पूरे घटनाक्रम को देखकर ज्यादा हैरान इस बात पर है कि एक गैंगस्टर अब पुलिस कप्तान को भी खुली चुनौती देने लगा है। मस्तराम की चौपाल में भी यही चर्चा छिड़ी रही। चेलों ने पूछा- “गुरुजी, मामला इतना बढ़ कैसे गया?” मस्तराम ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा-“भइया, छोटी-मोटी कुर्की-जब्ती से क्या होगा! डॉन तो पहले से तैयारी करके बैठा है। कार्रवाई ऐसी हो कि धमकी देने से पहले ही नेटवर्क डाउन हो जाए। अभी तो लगता है कि कार्रवाई कम और गैंगस्टर का कॉन्फिडेंस ज्यादा बढ़ रहा है।” खैर… राजनीति और अपराध का यह मैच अभी लंबा चलने वाला है साहब।

टीम बनाकर बल्लेबाजी कीजिए नहीं तो…

 

धनबाद-बोकारो मार्ग पर केंदुआडीह सड़क क्या बंद हुई, कोयलांचल की राजनीति को नई पिच मिल गई। कोई धरना की बल्लेबाजी कर रहा है, तो कोई मुआयना की फील्डिंग। अपने विधायकजी पहले बेमियादी धरना पर बैठे। फिर “उच्चस्तरीय वार्ता” नामक थर्ड अंपायर के भरोसे धरना स्थगित कर दिया गया। धरना की ही तरह बाद में वार्ता भी स्थगित। विधायकजी अब फिर से 24 घंटे के लिए धरना पर बैठ गए हैं। विधायकजी के आंदोलन को चैंबर ऑफ काॅमर्स का साथ मिल रहा है। उधर सांसद महोदय और विधायक मैडम ने भी मौका देखकर केंदुआडीह का दौरा कर लिया। बीसीसीएल और प्रशासन को अल्टीमेटम दिया। आजसू वाले भी पीछे क्यों रहते! जिलाध्यक्ष मंटू महतो ने भी आंदोलन की बैटिंग की। वहीं झामुमो का कहना है कि सड़क बंद होने के लिए केंद्र सरकार जिम्मेवार। कारण, बीसीसीएल केंद्र की एजेंसी। रणधीर वर्मा चौक पर मस्तराम की चौपाल में इस मैच का पोस्टमार्टम हुआ। मस्तराम बोले- “भइया, अलग-अलग बल्लेबाजी से रन नहीं बनता। टीम बनाकर खेलिए, नहीं तो जिला प्रशासन और बीसीसीएल चौके-छक्के मारते रहेंगे और जनता सिर्फ स्कोरबोर्ड देखती रह जाएगी।”

खैर… राजनीति है साहब, यहां सड़क से ज्यादा ‘स्टैंड’ मायने रखता है।

  “छापे पड़े उधर, लोग बीमार इधर!”

 

गिरिडीह में मिलावटखोरों के खिलाफ अभियान पूरे एक्शन मोड में था। कहीं मैदा जब्त हो रहा था, कहीं सूजी सील हो रही थी, तो कहीं बिना लाइसेंस वाले कारखानों पर नोटिस चिपकाए जा रहे हैं। कागजों में ऐसा माहौल बना कि लगा अब मिलावटखोर या तो सुधर जाएंगे या शहर छोड़ देंगे।

लेकिन मिलावट ने भी शायद सिस्टम को चुनौती दे रखी है। मसाला कारखाने पर छापेमारी और सैंपलिंग की खबर ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि गुपचुप-चाट ने शहर में मिलावट का कहर ढा दिया। करीब 60 लोग बीमार पड़ गए, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं। दुखद यह कि एक मासूम की जान भी चली गई।

अब फिर वही पुरानी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है-सैंपल लिया गया है, जांच होगी, रिपोर्ट आएगी। उधर विधायक मैडम और उपायुक्त पीड़ितों से मिलने पहुंचे, अधिकारियों को निर्देश दिए गए और सिस्टम फिर सक्रिय दिखने लगा। मस्तराम की चौपाल में इस पर नई परिभाषा गढ़ी गई-“गिरिडीह में मिलावट पर कार्रवाई वैसी ही है जैसे गुपचुप में पानी…ऊपर से साफ, अंदर क्या है भगवान जाने!” फिलहाल जनता यही पूछ रही है—साहब, फूड सेफ्टी ऑफिसर क्या कर रहे थे। जिम्मेवारों पर लगाम कसिए सब ठीक होगा। खैर, हम तो चुप ही रहेंगे।

“मंत्रीजी के इलाके में ‘प्राइवेट रोड’ से पहुंची सरकारी एम्बुलेंस!”

 

पीरटांड़ के खुखरा पंचायत में विकास ने आखिर गांव का रास्ता खोज ही लिया। हालांकि यह रास्ता सरकारी फाइलों, टेंडरों और योजनाओं से होकर नहीं, बल्कि पंचायत समिति सदस्य के निजी जेब से होकर निकला।

मंत्रीजी के विधानसभा क्षेत्र के सिन्दरपुर और धनेयडीह गांव वर्षों से सड़क के इंतजार में थे। बरसात में हालात ऐसे हो जाते थे कि मरीज अस्पताल पहुंचे या सीधे भगवान के भरोसे जाएं, कहना मुश्किल था। लेकिन फरवरी में पंचायत समिति सदस्य केशव पाठक ने अपने खर्च से कच्ची सड़क बनवा दी। नतीजा यह हुआ कि पहली बार एम्बुलेंस गांव तक पहुंची और एक गंभीर मरीज की जान बच सकी।

ग्रामीण अब इस सड़क को “जीवन रेखा” बता रहे हैं। उधर चौपाल में मस्तराम ने तंज कसा—“सरकारी योजनाएं अभी फाइल में रास्ता खोज रही हैं, तब तक गांव वालों ने निजी सड़क से एम्बुलेंस बुला ली।”

सबसे दिलचस्प बात यह कि जिस इलाके में मंत्रीजी विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं, वहां एक कच्ची सड़क ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी।

अब गांव वाले पूछ रहे हैं—अगर निजी खर्च से सड़क बन सकती है, तो सरकारी बजट आखिर किस दलदल में फंसा हुआ है?

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