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वर्तमान के कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आने वाला कल स्वतः ही खूबसूरत उपहार बनकर सामने आएगा

 

राजयोगिनी अस्मिता दीदी ने बताया कालिया नाग मर्दन का आध्यात्मिक रहस्य

डीजे न्यूज, बांगुर(कोलकाता) : “ज्योति बिन्दु परमात्मा से अब चल कर लें मिलन, प्रभु से मिलन कर पा लें परमानन्द का अनुभव…” जैसे मधुर और रूहानी गीत के साथ क्षेत्र में श्रीमद् भागवत कथा का भव्य शुभारंभ हुआ। ब्रह्माकुमारी सीजा के सुमधुर गायन ने उपस्थित जनसमुदाय को ईश्वरीय प्रेम से सराबोर कर दिया।

कथा के प्रथम सत्र की शुरुआत करते हुए मुख्य वक्ता राजयोगिनी अस्मिता दीदी ने ‘कल और आज’ के चक्र पर एक बेहद गहरा और व्यावहारिक दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य बीते हुए कल और आने वाले कल की चिंताओं में इतना व्यस्त है कि वह ‘आज’ को जीना भूल गया है। अंग्रेजी का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि आज को ‘प्रेजेंट’ कहा जाता है, जिसका अर्थ उपहार भी होता है। जिस प्रकार हम किसी को कोई उपहार पैकिंग में देते हैं, ठीक उसी तरह परमात्मा ने हमारे बीते हुए कल के कर्मों के आधार पर हमारे इस समय को एक सुंदर उपहार के रूप में पैक करके हमें दिया है। दुख की बात यह है कि हम उस उपहार को खोलकर देखने और उसका आनंद लेने के बजाय अपनी सोच को व्यर्थ की बातों में उलझाए रखते हैं। उन्होंने प्रेरित किया कि यदि वर्तमान के कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आने वाला कल स्वतः ही एक खूबसूरत उपहार बनकर सामने आएगा।

कालिया नाग मर्दन का आध्यात्मिक रहस्य

कथा के दौरान बाल कृष्ण द्वारा यमुना के गहरे पानी से गेंद लाने और कालिया नाग के मर्दन के प्रसंग का आध्यात्मिक रहस्य खोलते हुए अस्मिता दीदी ने बताया कि यहाँ ‘गेंद’ इस सृष्टि का प्रतीक है। जिस प्रकार गेंद गंदे पानी में चली गई, वैसे ही यह दुनिया आज काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी पाँच विकारों (कालिया नाग) के वश होकर पतित और जहरीली बन चुकी है। ऐसे समय में परमात्मा एक मासूम बालक के समान निष्पाप बनकर धरा पर आते हैं और इन विकारों पर विजय प्राप्त करते हैं। नाग के फन पर कृष्ण का नाचना वास्तव में बड़ी से बड़ी समस्याओं पर विजय पाकर खुशी में झूमने का प्रतीक है। उन्होंने आह्वान किया कि आइए, हम सब भी अपने विकारों पर जीत पाकर इस दुनिया को दुख के सागर से निकालकर आनंद और प्रेम के महासागर में ले चलें।

सुदामा के चरित्र से सीखें सच्ची मित्रता और समर्पण

परमात्मा से जुड़ाव पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि लौकिक माता-पिता भी अपनी संपत्ति का हक उसी बच्चे को देते हैं जो उनकी आज्ञा पर चलता है। ईश्वर भी हमें देने से पहले यह देखते हैं कि हम उनकी दिखाई राह पर चल रहे हैं या केवल उनकी महिमा के गीत गा रहे हैं। वर्तमान समय में हमारी स्थिति सुदामा जैसी है, जो अपनी कमियों के कारण ईश्वर का साथी बनने योग्य नहीं समझता। लेकिन सुदामा ने अपनी गरीबी या हैसियत की परवाह न कर हिम्मत दिखाई और द्वारकाधीश के पास पहुंचे। उन्होंने अपनी आत्मा की हस्ती को सागर समान माना, न कि बुलबुले समान। परमात्मा तो अपनी हर रचना को स्वीकार करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं, बस सुदामा जैसे बच्चों को अपनी हैसियत को किनारे रखकर परमात्मा को अपना सर्वस्व अर्पण कर सच्ची दोस्ती निभानी होगी।

ईश्वरीय रंग में झूमे श्रोता

कार्यक्रम के दौरान ब्रह्माकुमार सुमित प्रसाद ने परमात्मा की याद में एक अत्यंत भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर पंडाल में उपस्थित सभी श्रद्धालु ईश्वरीय आनंद में झूम उठे। कथा के सफल समापन पर बांगुर जोन की प्रमुख राजयोगिनी मधु दीदी ने उपस्थित सभी भाई-बहनों का ईश्वरीय टोली (प्रसाद) से मुंह मीठा कराया और अपनी शुभकामनाएं दीं।

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