पासा कहीं उलटा न पड़ जाए साहब 

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पासा कहीं उलटा न पड़ जाए साहब 

मस्तराम की चौपाल 

दिलीप सिन्हा : धनबाद से मुंबई के लिए नई ट्रेन को सांसद ढुलू महतो ने हरी झंडी क्या दिखाई, पटरियों से ज्यादा सियासत गरमा गई। उद्घाटन के मौके पर महापौर संजीव सिंह और उनकी पत्नी व विधायक रागिनी सिंह को बुलाया गया-फिर ऐन मौके पर “अनइनवाईटेड’ कर दिया गया। संजीव ने इसे जनता का अपमान बताया। अगले ही दिन रेलवे के दो अधिकारी माफी का प्रसाद लेकर उनके दरवाजे पहुंच गए। संजीव ने मुस्कान के साथ स्वागत भी किया और तीर भी चला दिया- इशारा “बड़े माननीय” की ओर। राजनीति में मौका मिले और कोई छोड़े-ऐसा भी कभी हुआ है? समर्थक तुरंत सक्रिय। डीआरएम का पुतला भी धूं-धूं कर जल उठा।

उधर रणधीर वर्मा चौक पर मस्तराम की चौपाल सजी थी। उन्होंने चुटकी ली-“चुनाव में सीधा हमला कर साबह ने पहले महापौर बनवा दिया। अब विरोध का ऐसा खेल खेल रहे हैं कि विरोधी को सहानुभूति भी मिल रही!” सलाह भी दे डाली- राजनीति में सब कुछ पचाना सीखें। जल्दबाजी में जो कदम उठा रहे हैं, उससे विरोधी और मजबूत हो रहे हैं। पासा कहीं उलटा न पड़ जाए साहब। खैर, ट्रेन अपनी रफ्तार से चली, लेकिन सियासत ने स्पीड पकड़ ली। यह राजनीति है साहब।

 मंत्री जी असम में तीर चलाएं, अस्पताल दम तोड़ें 

मंत्री जी असम में तीर-धनुष साधने में व्यस्त थे, और इधर उनका अपना गिरिडीह इलाज के लिए तरस रहा था। मस्तराम कहता है-नेतृत्व का निशाना जितना दूर जाता है, जमीनी हकीकत उतनी ही धुंधली हो जाती है।

चैताडीह का मातृत्व शिशु अस्पताल देख लीजिए। जलधारा पर ताला लटका है। चापाकल का हेड गायब- जैसे पानी नहीं, उम्मीद ही निकाल ली गई हो। एक फिल्टर कोने में यूं पड़ा है, मानो खुद सोच रहा हो कि “मुझे यहां क्यों रखा गया है?” सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीन कपड़े ओढ़कर सो रही है-क्योंकि उसे चलाने वाला कोई नहीं। लेकिन चेतावनी पूरी ऑन है-सिविल सर्जन साहब का फरमान गूंज रहा है कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। इधर ब्लड बैंक खून के लिए जूझ रहा है, जैसे व्यवस्था में ही खून की कमी हो गई हो। और चैताडीह का वातानुकूलित शवगृह? कभी वीआइपी शव रखने वाला यह भवन अब खुद ‘मृत’ पड़ा है। मस्तराम की सलाह सीधी है- मंत्री जी, असम से तीर-धनुष चलाकर लौट आएं हो तो अब अपने क्षेत्र की सेहत सुधारिए। जड़ से जुड़े रहिए। आखिर, राजनीति की असली पूंजी इसी जड़ पर बसती है। सारा चकाचौंध इसी के बल पर है… बाकी हम तो चुप ही रहेंगे।

 बिल बदलते ही बदला खेल : तीर-धनुष बाहर, कमल अंदर 

झारखंड की राजनीति भी अजीब है- यहां मुद्दे कम और “बिल बदलने” की कला ज्यादा चलती है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कमल फूल वाले नई ऊर्जा के साथ वापसी का सपना देख रहे थे। नए प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू आए, उम्मीद जगी, लेकिन किस्मत फिर रूठ गई। नगर निकाय चुनाव में तीर-धनुष वालों ने ऐसा झटका दिया कि कमल फिर मुरझा गया।

तभी विष्णुगढ़ में एक बेटी की हत्या ने सियासत को गरमा दिया। कमल फूल वाले सड़क पर उतर आए-मशाल जुलूस, झारखंड बंद, जोरदार प्रदर्शन। उधर तीर-धनुष वाले चुपचाप “बेचारे मोड” में बिल में दुबके रहे। लगा जैसे पूरा मैदान खाली छोड़ दिया हो। लेकिन राजनीति में सन्नाटा ज्यादा देर नहीं टिकता। अचानक कहानी पलटी- मामले में गिरफ्तार आरोपी का कनेक्शन कथित रूप से भाजपा से जुड़ा निकला। फिर क्या था, तीर-धनुष वाले बिल से बाहर आए और तस्वीरों की बारिश शुरू हो गई। सभी जिलाध्यक्षों को मोर्चा पर लगा दिया। अब कमल फूल वाले उसी बिल में दुबक कर सफाई देते नजर आ रहे हैं। कहानी साफ है- यहां मुद्दे नहीं, मौके खेल बदलते हैं। जो कल शिकारी था, आज शिकार है…और कल फिर कौन बिल बदलेगा, कहना मुश्किल है!

 पोस्टिंग का पैकेज: पैसा दो, शहर लो!

शिक्षा विभाग में इन दिनों ज्ञान नहीं, “स्थानांतरण विज्ञान” का बोलबाला है। नया फार्मूला साफ है-पैसा दीजिए, शहर में पोस्टिंग लीजिए। रेट भी तय है- एक लाख से डेढ़ लाख। मजे की बात, इतनी रकम देकर भी शिक्षक खुश हैं! वजह? देहात से छुटकारा और ऊपर से शहर का भत्ता-हर महीने दस हजार से ज्यादा का बोनस।

इधर शहर चमक रहा है, उधर टुंडी जैसे इलाके अंधेरे में जा रहे हैं। दिशोम गुरु शिबू सोरेन की कर्मभूमि टुंडी पहले से ही शिक्षकों की घोर कमी से जूझ रही थी, अब तो हालत और पतली हो गई है। कहीं एक स्कूल में एक ही शिक्षक बचा है, तो कहीं ताला लटकने की नौबत।

साहब के एजेंट भी कमाल के हैं- चप्पे-चप्पे पर तैनात। सीधे डील, तुरंत पोस्टिंग। जैसे शिक्षा नहीं, प्लॉट की खरीद-फरोख्त चल रही हो।

सबसे बड़ा सवाल- आदिवासी बच्चों की पढ़ाई का क्या? भाषणों में तो उनके नाम की माला जपी जाती है, लेकिन हकीकत में स्कूल सूने हैं। अस्पतालों में डॉक्टर नहीं जाते हैं। कुल मिलाकर, यहां शिक्षा नहीं, “पोस्टिंग उद्योग” फल-फूल रहा है। ज्ञान की जगह नोटों का सिलेबस चल रहा है- और टुंडी के बच्चे आज भी खाली क्लासरूम में भविष्य ढूंढ रहे हैं।

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