

















































मौनी अमावस्या व संथाली जतरा पर करमदाहा दुखिया बाबा मेला में उमड़ा आस्था का सैलाब 

आपसी भाईचारे, सद्भाव और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, चार सौ वर्षों की परंपरा आज भी है जीवंत
संजीत तिवारी, टुंडी(धनबाद) : टुंडी प्रखंड से सटे करमदाहा स्थित दुखिया महादेव मंदिर के प्रांगण में लगने वाले पन्द्रह दिवसीय ऐतिहासिक मेला में रविवार को मौनी अमावस्या एवं संथाली जतरा के कार्यक्रम के कारण पूरा मेला परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। भक्ति, आस्था और परंपरा से जुड़ा यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, जहां दूर-दराज से आए श्रद्धालु पूरे श्रद्धा भाव से शामिल होते हैं।
इस मेले में श्रद्धालु अच्छी फसल होने की खुशी में दुखिया बाबा मंदिर में धान की बाली अर्पित करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से आने वाले समय में भी खेत-खलिहान हरे-भरे रहते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यह ऐतिहासिक मेला सत्रहवीं सदी से आयोजित होता आ रहा है, जो अपने आप में इस क्षेत्र की समृद्ध परंपरा और आस्था का प्रतीक है।
मेले में हर वर्ग का विशेष ध्यान रखा गया है। बच्चों और नवयुवकों के मनोरंजन के लिए झूले, खेल-खिलौने और विभिन्न आकर्षण उपलब्ध हैं। वहीं गृहस्थों के लिए बर्तन, खेती योग्य उपकरण, घरेलू उपयोग की सामग्री सहित कई तरह के स्टॉल लगाए गए हैं। यह मेला क्षेत्र के लोगों के लिए खुशियों का सौगात लेकर आता है। जो लोग जीविकोपार्जन के लिए दूसरे राज्यों में काम करते हैं, वे भी इस अवसर पर अपने गांव जरूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही व्याही बेटियां भी मायके आकर माता-पिता और परिजनों से मिलती हैं, जिससे मेला पारिवारिक मिलन का भी केंद्र बन जाता है।
मेले के मुख्य द्वार के सामने जन सूचना विभाग द्वारा एक भव्य प्रदर्शनी भी लगाई गई है, जिसमें झारखंड सरकार द्वारा संचालित जनहित से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की जानकारी आम लोगों को दी जा रही है। लोग योजनाओं से जुड़ी जानकारी लेकर इसका लाभ उठाने के प्रति जागरूक हो रहे हैं।
इस मेले में काफी दूर-दराज से व्यापारी कारोबार करने पहुंचते हैं। पन्द्रह दिनों तक चलने वाले इस मेले के दौरान लाखों रुपये का कारोबार होता है। बड़े व्यापारी भी यहां अपने उत्पाद बेचने पहुंचते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।
करमदाहा मेला दुखिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध है। बराकर नदी के करमदाहा घाट के किनारे स्थित यह मंदिर दुखिया बाबा की महिमा के लिए जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस इलाके में भीषण अकाल पड़ा था। फसल नहीं होने के कारण लोगों के सामने खाने तक का संकट खड़ा हो गया था। उसी समय बराकर नदी के किनारे करमदाहा घाट पर दुखिया बाबा प्रकट हुए। श्रद्धालुओं ने दुखिया बाबा से प्रार्थना की, जिसके बाद बाबा ने अपने भक्तों के दुखों का हरण करते हुए उस क्षेत्र में भरपूर बारिश कराई। बारिश के बाद अच्छी फसल हुई और लोगों के कष्ट दूर हो गए। तभी से दुखिया बाबा इस पूरे इलाके में आस्था के केंद्र बन गए।
मकर संक्रांति के दिन दुखिया बाबा मंदिर परिसर में मेले का आयोजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार, जिनकी भी फसल होती है, वे सबसे पहले दुखिया बाबा को अर्पित करते हैं, उसके बाद ही स्वयं फसल ग्रहण करते हैं। इसी परंपरा से करमदाहा मेले का शुभारंभ माना जाता है। आज यह मेला एक वृहत स्वरूप ले चुका है और इसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पन्द्रह दिनों तक चलने वाला यह मेला आपसी भाईचारे, सद्भाव और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। सभी धर्म, जाति और समुदाय के लोग एक साथ आकर दुखिया बाबा के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। करमदाहा मेला न सिर्फ धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सामाजिक एकता, परंपरा और संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।



