























































मैं जिंदगी हूं………

टुंडी के सुरम्य वादियों में बसा खारियोटांड गांव…
यहां सुनाई देती है मान्दर की मधुर
थाप….
बन्दना और बरदखूंटा के पारंपरिक गीत..
ठंड की सिहरन में मानो संस्कृति का हो रहा उदघोश हो.
गरीबी के तम को चीरती मानो उल्लास की जीत हो…
परंपरा सघन दारिद्र पर भारी है….
गम की छाती पर संगीत और नृत्य की अँगड़ाई है….
शायद कल सुबह फिर जिंदगी शुरू होगी वही पुरानी सी…
तब पेट के लिए पुनः सखुआ के पत्ते तोड़े जाएंगे…
बनेंगे पत्तल और दोने बाजार के लिए…
मन्गरू बेच आयेगा लकड़ियों का गट्ठर टुंडी बाजार में.
सोन्वा फिर झोड़ा और कुदाल ले मिट्टी काटने जाएगा…
हिरना कोयला ढोने के लिए लग जाएगा साइकल की जुगाड़ में ..
बाहामुनी दतुवन तोड़ बेचने जायेगी पास के गांव में …
झरूवा वृद्धा पेंशन की गुहार लगाने जाएगा बाबुओं के दरवार में ….
इस तरह ज़िंदगी फिर से पटरी पर आएगी…
बरदखूंटा खत्म, बैल मुक्त किंतु जिंदगी पुन : कैद हो जाएगी…..
जयंत चक्रपाणि, शिक्षक



