



गढ़ में हार से घिरी भाजपा, अब क्या है वापसी का रास्ता?
भाजपा स्थापना दिवस पर देवभूमि झारखंड न्यूज की विशेष रिपोर्ट

दिलीप सिन्हा, राजनीतिक संवाददाता देवभूमि झारखंड न्यूज, धनबाद : भाजपा की स्थापना छह अप्रैल 1980 में हुई थी। भाजपा इसी तारीख को सोमवार को पार्टी का स्थापना दिवस देशभर में धूमधाम से मनाएगी। इसके लिए पार्टी कार्यालयों को भव्य रूप से सजाया गया है। स्थापना दिवस पर झारखंड भाजपा को आत्ममंथन करने की जरूरत है। राज्य में पार्टी की जो साख गिरी है, उसे कैसे वापस लाया जाए। साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का जो तिलस्म है, उससे कैसे निपटा जाए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखंड में भाजपा अपने सबसे खराब स्थिति में पहुंच चुकी है। विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति तो हुई थी उससे अधिक दुर्गति नगर निकाय चुनाव में हुआ। धनबाद और गिरिडीह जैसे गढ़ में नगर निकाय से भाजपा का बेदखल होना निश्चित रूप से नेतृत्व पर सवाल खड़ा करता है। यह स्थिति तब है, जब भाजपा के पास राज्य में पांच-पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। यह हैं बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, चंपई सोरेन व मधु कोड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री व इन दिग्गज नेताओं के गृह क्षेत्र में भी भाजपा नगर निकाय चुनाव हार गई। ऐसे में मंथन करने के लिए स्थापना दिवस से बेहतर मौका पार्टी को नहीं मिल सकती है। झारखंड की सत्ता में वापसी का क्या रास्ता है, इस पर जमीनी स्तर पर मंथन करने की जरूरत है। भाजपा ने जिन दो बड़े नेता बाबूलाल मरांडी और चंपई सोरेन की पार्टी में ताजपोशी की वे आदिवासियों को झामुमो से तोड़ने के मिशन में कामयाब नहीं हो सके। 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सिर्फ एक आदिवासी सुरक्षित सीट से जीत सकी, वह सीट है चंपई सोरेन की सरायकेला। बाकी तमाम आदिवासी सुरक्षित सीटों पर झामुमो और उसके सहयोगी कांग्रेस ने कब्जा किया। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा एक भी आदिवासी सुरक्षित सीट झारखंड से नहीं जीत सकी। कोल्हान जहां पार्टी के दिग्गज नेता रघुवर दास, अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन व मधु कोड़ा हैं, वहां भी झामुमो का जादू चला। संथाल परगना तो झामुमो का किला है ही। बाबूलाल मरांडी के गृह जिले गिरिडीह में छह में से तीन सीट झामुमो

और एक सीट जेएलकेएम के युवा नेता जयराम महतो ले गए। भाजपा से मात्र बाबूलाल मरांडी और नागेंद्र महतो जीते। कुल मिलाकर उत्तरी छोटानागपुर ने ही भाजपा की लाज बचाई।

आदित्य साहू की नई टीम भी नहीं दिखा पा रही तेवर

राज्यसभा सदस्य आदित्य साहू के नेतृत्व में राज्य में भाजपा की नई टीम काम संभाल चुकी है। भाजपा की नई टीम हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ अब तक आक्रामक तेवर नहीं दिखा पाई है। यह कमी भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि युवा आक्रामक तेवर के साथ सरकार पर हमला बोलना चाहते हैं। भाजपा नेतृत्व ऐसा नहीं कर पा रहा है। कई कार्यकर्ताओं ने बताया कि अभी पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व की जरूरत थी। आक्रामक तेवर के साथ रघुवर का सरकार पर हमला कार्यकर्ताओं को पसंद है। बहरहाल, आदित्य साहू की टीम को अभी खुद को स्थापित करना होगा।


2024 विधानसभा चुनाव : 56 विधायकों के साथ हेमंत ने की वापसी, भाजपा गठबंधन के खाते में मात्र 24
2024 विधानसभा चुनाव में 81 सदस्यीय विधानसभा में हेमंत सोरेन ने रिकार्ड 56 सीटों के साथ सरकार में वापसी की। इस चुनाव में झामुमो अकेले 34 सीटें जीतकर आया वहीं उसकी सहयोगी कांग्रेस 16, राजद चार और भाकपा माले दो सीटें जीतीं। अब भाजपा और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन देख लीजिए। भाजपा की सीटें गिरकर 21 पर आ गई। उसकी सहयोगी आजसू भी फिसड्डी साबित हुई। किसी तरह से आजसू का खाता खुला। जदयू और रालोजपा एक-एक सीट जीतने में सफल रही।

2019 विधानसभा चुनाव : झामुमो 30 और भाजपा 25 सीटें जीती थी
इसके पीछे 2019 विधानसभा चुनाव में जाएं तो आप देखेंगे कि भले ही भाजपा की सरकार चली गई लेकिन भाजपा ने झामुमो को टक्कर दिया। उस चुनाव में झामुमो के 30 और भाजपा के 25 विधायक जीते थे। कांग्रेस इस चुनाव में भी 16 सीटें जीतकर आई थी। राजद और भाकपा माले को एक-एक सीट मिली थी। वहीं आजसू दो, झाविमो तीन, एनसीपी एक सीट जीती थी।
2014 विधानसभा चुनाव : झामुमो से लगभग दोहरी सीटें जीती थी भाजपा
2014 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था और सरकार बनाई थी। इस चुनाव में भाजपा झामुमो से लगभग दोहरी सीटें जीती थी। भाजपा के जहां 37 विधायक जीतकर आए थे वहीं झामुमो के मात्र 19 विधायक जीते थे। बाबूलाल मरांडी की पार्टी झाविमो के आठ और कांग्रेस के छह विधायक जीते थे। आजसू भी पांच सीटें जीतने में सफल रही थी।


