

बड़ा बेटा सोमेश को मिली रामदास सोरेन की गद्दी
घाटशिला में संभालेंगे झामुमो का तीर कमान

सोमेश के सामने प्रतिद्वंद्वी बाबूलाल होंगे या कोई नया योद्धा
बिहार चुनाव के साथ हो सकता घाटशिला का उप चुनाव
दिलीप सिन्हा, धनबाद :
शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन की गद्दी उनके बड़े बेटे सोमेश सोरेन संभालेंगे। परिवार के भीतर चिंतन मनन के बाद उत्तराधिकार तय हो गया। अब सोमेश ही रामदास सोरेन की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे। उनके चचेरे भाई विक्टर सोरेन और मंगल सोरेन इसमें उनके सहयोगी की भूमिका निभाएंगे। झामुमो प्रमुख सह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी रामदास सोरेन के परिवार के इस फैसले पर अपनी रजामंदी जताई है।
रामदास सोरेन के निधन होने से उनकी घाटशिला विधानसभा सीट खाली हो गई है। संभव है कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ चुनाव आयोग अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित घाटशिला विधानसभा सीट पर उप चुनाव भी कराए। ऐसा हुआ तो नवंबर महीने तक घाटशिला विधानसभा उप चुनाव हो जाएगा। घाटशिला में चुनावी सुगबुगाहट भी होने लगी है। अपने पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन का श्राद्ध कार्य समाप्त कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी व गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन के साथ रामदास सोरेन के जमशेदपुर स्थित आवास पहुंचे थे। उनकी पत्नी व बेटों से मिलकर उन्हें सांत्वना दी थी।
सोमेश सोरेन राजनीति में नया चेहरा है। रामदास सोरेन के साथ राजनीतिक गतिविधियों में भतीजे विक्टर सोरेन और मंगल सोरेन सक्रिय रहते थे। घाटशिला के गांव गांव में विक्टर और मंगल को जानने और पहचानने वाले हैं। संयुक्त परिवार है। इस नाते अभी रामदास के परिवार के भीतर एका बनी हुई है। उप चुनाव में सोमेश के लिए विक्टर और मंगल की भी अहम भूमिका होगी। इतना जरूर है कि रामदास सोरेन के दिवंगत होने के बाद सहानुभूति का लाभ उनकी पत्नी या बेटा के ही चुनावी मैदान में उतरने पर अधिक मिलेगा।
अभी यह तय नहीं है कि भाजपा घाटशिला उप चुनाव में किसे उम्मीदवार बनाएगी। कायदे से उम्मीदवार तय करने का समय भी नहीं आया है। पूर्व सीएम चंपई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन के नाम की चर्चा शुरू है। पिछले चुनाव में बाबूलाल के साथ सक्रिय लोगों की सक्रियता फिर बढ़ गई है। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से तीन बार चुनाव जीत चुके प्रदीप कुमार बलमुचू पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं। बलमुचू का आज भी घाटशिला में मजबूत जनाधार है। बलमुचू से लड़कर ही रामदास सोरेन ने घाटशिला सीट झामुमो के पाले में डाला था।
घाटशिला पर्यटन का बड़ा केंद्र है। यहां तांबा, यूरेनियम की खदानें हैं। जंगल और पहाड़ है।
रामदास सोरेन पहली बार यहां से 2009 में विधायक चुने गए थे। तब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व झामुमो का गठबंधन टूट गया था। कांग्रेस से चौका लगाने बलमुचू उतरे, तो सामने झामुमो से रामदास सोरेन एवं भाजपा से फायरब्रांड नेता व पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा थे। कांटे की लड़ाई में रामदास ने बलमुचू को करीब 1192 वोटों से हरा दिया था। पहली बार रामदास विधानसभा पहुंचे थे। इसके बाद हुए 2014 के विधानसभा चुनाव में रामदास को भाजपा के लक्ष्मण टुडू ने हरा दिया। पांच साल बाद हुए 2019 के चुनाव में उन्होंने वापसी की। रामदास सोरेन के लिए सबसे बड़ी चुनौती 2024 के विधानसभा चुनाव में थी। कारण, पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा ने रामदास सोरेन के खिलाफ चंपई के बेटे बाबूलाल सोरेन को उतारा था।
झारखंड की राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी रघुवंशी बताते हैं, प्रदीप बालमुचू जैसे कद्दावर नेता को किनारे करने वाले रामदास सोरेन जमीनी नेता रहे हैं। रामदास ने लंबी नाकामी देखी। हार नहीं मानना और मंजिल पाने की जिद से उन्हें मुकाम हासिल हुआ। उनके पुत्र सोमेश राजनीति में नए है। पिता को सियासत करते देखे है। उन्हें बहुत कुछ सीखना है। अच्छी बात है कि उन पर कोई दाग नहीं है। नया चेहरा है। अश्विनी रघुवंशी मानते है कि भाजपा यदि बाबूलाल सोरेन को उम्मीदवार बनाती है तो घाटशिला का उप चुनाव वाकई दिलचस्प होगा। झामुमो सत्ता में है। न सिर्फ सोमेश सोरेन अपितु हेमंत सोरेन की भी भरपूर कोशिश होगी कि घाटशिला का किला फतह करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी जाय। कारण कि झामुमो में हर कोई जनता है कि तनिक भी मौका मिला तो चंपई सोरेन चूकेंगे नहीं।
