आइआइटी-आइएसएम में नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन एंशिएंट इंडियन टेक्स्ट, साइंस एंड टेक्नोलॉजी का शुभारंभ भारतीय ज्ञान परंपरा में थ्योरी और एप्लिकेशन का संतुलित समन्वय: प्रो. सुकुमार मिश्रा

Advertisements

आइआइटी-आइएसएम में नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन एंशिएंट इंडियन टेक्स्ट, साइंस एंड टेक्नोलॉजी का शुभारंभ

भारतीय ज्ञान परंपरा में थ्योरी और एप्लिकेशन का संतुलित समन्वय: प्रो. सुकुमार मिश्रा

डीजे न्यूज, धनबाद:
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में तीन दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन एंशिएंट इंडियन टेक्स्ट, साइंस एंड टेक्नोलॉजी का बुधवार को गोल्डन जुबली लेक्चर थियेटर (GJLT) में भव्य उद्घाटन हुआ। यह सम्मेलन 25 से 27 फरवरी तक आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम को ICPR और ANRF का सहयोग प्राप्त है तथा इसका संयुक्त आयोजन डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज, IIT (ISM) धनबाद और सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स द्वारा किया जा रहा है

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। सम्मेलन के संयोजक एवं डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज, IIT (ISM) धनबाद के अध्यक्ष प्रो. ज्ञान प्रकाश ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज के दौर में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक साइंस और टेक्नोलॉजी के संदर्भ में समझना बेहद जरूरी है।

सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए आईआईटी (आईएसएम) के निदेशक प्रो. सुकुमार मिश्रा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचीन भारतीय ग्रंथों की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि “ज्ञान” का अर्थ है समझ, “विज्ञान” उस ज्ञान का विश्लेषण है, और “प्रौद्योगिकी” विज्ञान का व्यावहारिक रूप है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब विज्ञान समाज और अर्थव्यवस्था के लिए ठोस परिणाम देता है, तो वही प्रौद्योगिकी बन जाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में थ्योरी और एप्लिकेशन का संतुलित समन्वय हमेशा से रहा है।

मुख्य अतिथि प्रो. सी. डी. सेबास्टियन (आईआईटी बॉम्बे) ने “सांख्य थॉट एंड मॉडर्न साइंस: कॉन्वर्जेंस इन द एंशिएंट इंडियन टेक्स्ट सांख्य कारिका” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह प्राचीन सांख्य दर्शन के सिद्धांत आधुनिक वैज्ञानिक सोच से कई स्तरों पर मेल खाते हैं।

विशिष्ट अतिथि स्वामी कृपमयानंद अवधूत ने अपने संबोधन में अध्यात्म, धर्म और साइंस के संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में साइंस को आध्यात्मिक मूल्यों से अलग नहीं देखा गया, बल्कि दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में समझा गया है।

कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जो सह-संयोजक प्रो. श्रुति कानूनगो द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके बाद सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का समूह छायाचित्र लिया गया।

उद्घाटन सत्र के बाद विभिन्न तकनीकी सत्रों में देशभर से आए विद्वानों ने प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों, दर्शन, पारिस्थितिकी, न्याय, योग और साइंस से जुड़े विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए

सम्मेलन अगले दो दिनों तक जारी रहेगा, जिसमें कई महत्वपूर्ण लेक्चर, रिसर्च पेपर प्रेजेंटेशन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial
Scroll to Top