



आदित्य साहू के सिर पर सजा है कांटों भरा ताज

बाबूलाल और आदित्य साहू की जोड़ी के लिए संथाल परगना और कोल्हान में झामुमो की चुनौती से जूझना आसान नहीं होगा
किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा नगर निकाय चुनाव
दिलीप सिन्हा, धनबाद : झारखंड भाजपा को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल चुका है। राज्यसभा सदस्य आदित्य साहू के सिर पर ताज सजा है, लेकिन यह ताज कांटों से भरा हुआ है। ऐसे समय में जब झारखंड में भाजपा की सांगठनिक स्थिति कमजोर मानी जा रही है, पार्टी के भीतर गुटबाजी अपने चरम पर है और कार्यकर्ताओं में निराशा साफ झलकती है। विधानसभा चुनाव में झामुमो के सामने करारी हार ने भाजपा को आत्ममंथन के दौर में धकेल दिया है। ऐसे हालात में आदित्य साहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को फिर से खड़ा करना है।

प्रदेश अध्यक्ष बनते ही उनके सामने वक्त की कमी सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी है। महज डेढ़ से दो महीने के भीतर नगर निकाय चुनाव होने हैं। यह चुनाव आदित्य साहू के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं माने जा रहे हैं। यह अलग बात है निकाय चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहा है। बावजूद सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी समर्थित प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की तैयारी में जुट गई है।
संगठन की कमजोर जड़ें, आपसी मतभेद और चुनावी तैयारी—तीनों मोर्चों पर उन्हें एक साथ काम करना होगा। अगर नगर निकाय चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा, तो इसका सीधा असर उनके नेतृत्व पर पड़ेगा। हालांकि कमान संभालते ही आदित्य साहू ने नगर निकाय चुनाव के लिए पसीना बहाना शुरू कर दिया है। निकाय चुनाव में पार्टी समर्थित प्रत्याशियों के चयन के लिए प्रमंडलीय कमेटियां बना दी है। धनबाद प्रमंडल में धनबाद के विधायक राज सिन्हा को जिम्मेवारी दी गई है। विधायक राज सिन्हा ने इसके लिए मंथन शुरू कर दिया है।

इसके साथ ही नजरें तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी टिकी हैं। यही वह चुनाव होगा, जो आदित्य साहू की असली राजनीतिक पहचान तय करेगा। भाजपा इस चुनाव को उनकी अध्यक्षता में लड़ेगी और पार्टी को उनसे एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट रणनीति की उम्मीद है। चुनौती यह भी है कि गुटबाजी को खत्म कर सभी धड़ों को एक मंच पर लाया जाए, ताकि कार्यकर्ता पूरे मन से मैदान में उतर सकें। विधानसभा चुनाव परिणाम बताता है कि बाबूलाल मरांडी और आदित्य साहू की जोड़ी के लिए संथाल परगना और कोल्हान में झामुमो की चुनौती से जूझना आसान नहीं होगा।
आदित्य साहू के लिए यह वक्त फैसलों का है—कड़े फैसले, त्वरित फैसले और दूरगामी सोच वाले फैसले। सवाल यही है कि क्या वे बिखरी हुई भाजपा को फिर से संगठित कर पाएंगे? क्या नगर निकाय चुनाव में पार्टी अपनी खोई साख वापस हासिल कर सकेगी? और क्या तीन साल बाद विधानसभा में भाजपा सत्ता की लड़ाई में मजबूती से लौटेगी?
झारखंड की राजनीति में यह ताज आसान नहीं है। कांटों के बीच रास्ता बनाना ही आदित्य साहू की सबसे बड़ी परीक्षा है। वैसे भाजपा के लिए संतोष की बात यह है कि सरस्वती पूजा के दिन बाबूलाल मरांडी से प्रदेश अध्यक्ष का प्रभार लेने के दूसरे दिन ही शनिवार को वह जिलों में प्रवास के लिए निकल गए हैं। पहले दिन वह रांची से चलकर गिरिडीह हाेते हुए देवघर पहुंचे हैं। दूसरे दिन रविवार को दुमका से होते हुए धनबाद पहुंचेंगे। आदित्य साहू के इस दौरे से कार्यकर्ताओं के मुरझाए चेहरे खिल उठे हैं। जगह-जगह वह कार्यकर्ताओं को संबोधित भी कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सुरेश साव ने देवभूमि झारखंड न्यूज को बताया कि झारखंड में भाजपा नए तेवर के साथ उतरी है। आने वाले दिनों में जमीन पर भाजपा की सक्रियता और दिखेगी। हम न सिर्फ निकाय चुनाव में भाजपा का झंडा बुलंद करेंगे बल्कि आने वाले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में झामुमो-कांग्रेस गठबंधन को पीछे धकेल देंगे। जहां तक गुटबाजी का सवाल है तो भाजपा में कोई गुटबाजी नहीं है।



