क्रिटिकल मिनरल्स में आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी तकनीक और रिसर्च पर जोर, आईआईटी (आईएसएम) में राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

क्रिटिकल मिनरल्स में आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी तकनीक और रिसर्च पर जोर, आईआईटी (आईएसएम) में राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

सुरक्षित सप्लाई चेन, खनिजों की प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग को लेकर देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किए विचार

डीजे न्यूज, धनबाद : देश को क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने तथा वैश्विक स्तर पर मजबूत औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में शनिवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत हुई। ‘क्रिटिकल मिनरल्स एंड रेयर अर्थ्स (CMRE 2026)’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में नीति आयोग, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों के विशेषज्ञों ने खनिज संसाधनों की उपलब्धता, स्वदेशी तकनीक, सुरक्षित सप्लाई चेन और रिसाइक्लिंग की संभावनाओं पर मंथन किया।

आईआईटी (आईएसएम) के फ्यूल, मिनरल्स एंड मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग (एफएमएमई) विभाग की ओर से इंडियन काउंसिल ऑफ केमिस्ट्स के 45वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन के विशेष सिम्पोजियम के रूप में टेक्समिन के सहयोग से इसका आयोजन किया गया। उद्घाटन नीति आयोग के सदस्य प्रो. गोबर्धन दास ने किया। मौके पर इंडियन काउंसिल ऑफ केमिस्ट्स के अध्यक्ष प्रो. रंजीत कुमार वर्मा, संगोष्ठी के सेक्शनल प्रेसिडेंट प्रो. ध्रुव कुमार सिंह, विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न सोरेन और संयोजक डॉ. बी. राजशेखर रेड्डी उपस्थित थे।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. गोबर्धन दास ने कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स देश की सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, रक्षा और आधुनिक विनिर्माण क्षेत्र के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। भारत को केवल खनिज भंडार तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनकी खोज से लेकर प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, एडवांस मटेरियल और मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन में अपनी क्षमता विकसित करनी होगी।

उन्होंने वर्ष 2025 में शुरू किए गए नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके लिए सात वर्षों में करीब 34,300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं, रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की योजना और सालाना छह हजार टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने फ्लाई ऐश, रेड मड, ई-वेस्ट और औद्योगिक अवशेषों से उपयोगी खनिजों की रिकवरी को भी महत्वपूर्ण बताया।

प्रो. ध्रुव कुमार सिंह ने कहा कि खनिजों की खोज के साथ उनकी प्रोसेसिंग, सेपरेशन, मैन्युफैक्चरिंग और रिसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित करना जरूरी है। इसके लिए शोध संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। प्रो. शत्रुघ्न सोरेन ने तकनीकी नवाचार और शोध में विभाग की भूमिका बताई, जबकि प्रो. रंजीत कुमार वर्मा ने देश के प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया।

नीति, संसाधन सुरक्षा और रिसाइक्लिंग पर तकनीकी मंथन

उद्घाटन के बाद आयोजित तकनीकी सत्रों में क्रिटिकल मिनरल्स की नीति, संसाधन सुरक्षा और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई। एटॉमिक मिनरल्स डायरेक्टरेट, इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड, न्यूक्लियर फ्यूल कॉम्प्लेक्स, नीति आयोग और सीएसआईआर-नेशनल मेटलर्जिकल लैबोरेटरी के विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

उच्चस्तरीय पैनल चर्चा में भारत के लिए सुरक्षित और सर्कुलर क्रिटिकल मिनरल्स वैल्यू चेन विकसित करने की चुनौतियों पर विमर्श किया गया। वहीं, नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, स्वदेशी तकनीक, रिसाइक्लिंग और उद्योगों के साथ साझेदारी को लेकर भी विशेषज्ञों ने सुझाव दिए। कोयले से जुड़े संसाधनों और औद्योगिक अवशेषों से महत्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति पर विशेष चर्चा हुई।

दूसरे दिन उद्योग और सस्टेनेबल रिसोर्स रिकवरी पर चर्चा

संगोष्ठी के दूसरे दिन एक नवंबर को टेक्समिन हॉल में दो तकनीकी सत्र आयोजित होंगे। इनमें उद्योगों की भूमिका, निवेश की संभावनाओं, स्वदेशी रेयर अर्थ मैग्नेट वैल्यू चेन, अर्बन माइनिंग और रिसाइक्लिंग पर चर्चा की जाएगी।

इसके अलावा इस्तेमाल हो चुके परमानेंट मैग्नेट से रेयर अर्थ की रिकवरी, औद्योगिक अवशेषों से कोबाल्ट निकालने, ई-वेस्ट और पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों की रिसाइक्लिंग तथा कोयले के उप-उत्पादों से हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स प्राप्त करने की तकनीकों पर भी मंथन होगा। वैलेडिक्टरी सत्र के साथ दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन किया जाएगा।

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial
Scroll to Top