डीडीसी साहब का सिंहम अवतार

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डीडीसी साहब का सिंहम अवतार

मस्तराम की चौपाल

दिलीप सिन्हा

फिल्मों में आपने अजय देवगन को “सिंघम” बनते देखा होगा। मूंछ तानकर गाड़ी से उतरना, आंख लाल करना और विलेन की हवा टाइट कर देना। लेकिन धनबाद में असली “सिंघम” तो हमारे डीडीसी सन्नी राज साहब निकले। फर्क बस इतना कि यहां बैकग्राउंड में म्यूजिक नहीं बज रहा था, बाकी सीन पूरा फिल्मी था।

मामला बलियापुर जलापूर्ति योजना का। श्रीराम ईपीसी के ऑपरेटर 11 महीने से वेतन के इंतजार में थे। बेचारे मजदूरों ने सोचा-जब पेट में पानी नहीं, तो जनता को पानी क्यों दें! नतीजा, नौ हजार घरों का नल सूखा पड़ा रहा।

इधर समीक्षा बैठक चल रही थी। कंपनी के डीजीएम राजीव रंजन साहब आराम से कुर्सी पर बैठे थे कि तभी डीडीसी साहब का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। बोले-“सरकार का पैसा लेकर मजदूरों का वेतन खा गए और जनता का पानी बंद करा दिए! अभी भुगतान कराओ नहीं तो सीधे जेल जाओ।”

फिर क्या था! पुलिस को फोन, अफसरों की घेराबंदी और कंपनी वालों के चेहरे से रंग गायब। रात आठ बजे तक “मीटिंग” चलती रही। आखिरकार पानी चालू हुआ। अब लोग कह रहे हैं-धनबाद में पाइपलाइन से ज्यादा असर डीडीसी साहब की लाइन का है! खैर हम तो चुप ही रहेंगे।

“बाघमारा में मेयर की हुंकार, झरिया में सांसद की दहाड़”

कोयलांचल की राजनीति भी बड़ी दिलचस्प चीज है। यहां नेता जनता के लिए कम और एक-दूसरे को “लोकेशन अपडेट” देने के लिए ज्यादा यात्रा निकालते हैं। शहर की सरकार क्या बनी, राजनीतिक जंगल में नया शेर उतर आया। अब तक अकेले दहाड़ रहे सांसद ढुलू महतो के सामने मेयर संजीव सिंह भी खड़े हो गए।

मेयर साहब ने सबसे पहले सांसद के गढ़ बाघमारा में आभार यात्रा निकाल दी। संदेश साफ था-“जंगल सिर्फ आपका नहीं है।” उधर मेयर के अनुज भी इलाके में ऐसे सक्रिय हुए जैसे अगले एपिसोड की तैयारी चल रही हो।

सांसद जी भी कहां चुप बैठने वाले थे। उन्होंने झरिया में पदयात्रा निकाल कर बता दिया कि राजनीति में “होम एंड अवे मैच” दोनों खेलना आता है। समर्थकों की भीड़ देखकर लग रहा था मानो चुनाव नहीं, शक्ति प्रदर्शन प्रीमियर लीग चल रही हो।

इस पूरे युद्ध में झरिया विधायक रागिनी सिंह शांत नजर आ रही हैं। शायद वे सोच रही हों-“दोनों शेर दहाड़ लें, जंगल तो आखिर भाजपा का ही है।”

मस्तराम ने चेलों को समझाया-“मांद बदल-बदल कर दहाड़ने से कुछ नहीं होगा। आखिर मंच साझा करना ही पड़ेगा। पोस्टर और शिलापट्ट में नाम होने न होने से जनता का गड्ढा नहीं भरता।”

अपनी सरकार, अपना मुकदमा… कांग्रेसी बेहाल”

कोयलांचल की राजनीति भी बड़ी निराली है। कांग्रेसियों के हाथ में सत्ता है, लेकिन हाल ऐसा कि मलाई तो दूर, मुकदमे की रसीद थमाई जा रही है। बेचारे कार्यकर्ता सोच रहे थे कि अपनी सरकार में आंदोलन करेंगे तो अफसर चाय-पानी पूछेंगे, पर यहां तो सीधे एफआईआर का प्रसाद मिल गया।

बिजली-पानी की समस्या को लेकर कांग्रेसी अंचल कार्यालय पहुंचे थे। नेताओं को उम्मीद थी कि साहब कुर्सी छोड़कर स्वागत करेंगे। लेकिन साहब भी सरकारी मूड में थे। बात बहस तक पहुंची और फिर मामला थाना-कचहरी तक। नेताओं पर प्राथमिकी हुई तो कांग्रेसियों का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। जवाब में साहब पर भी केस ठोक दिया गया। ऊपर से मंत्रीजी का बयान भी आ गया।

फिर तय हुआ कि जेल भरो आंदोलन होगा। कार्यकर्ता भी जोश में थे कि चलो अपनी ही सरकार में जेल यात्रा का अनुभव ले लेते हैं। लेकिन प्रदेश नेतृत्व ने किरकिरी का खतरा भांप लिया। आंदोलन की हवा धीरे से निकाल दी गई। रणधीर वर्मा चौक पर सभा हुई, ज्ञापन सौंपा गया और लोकतंत्र को सलाम कर सब घर लौट गए।

मस्तराम बोले-कांग्रेसियों की हालत ऐसी हो गई है कि सत्ता उनकी, सरकार उनकी, लेकिन डर अफसरों का। अब समझिए, असली विपक्ष कौन है!

“गर्मी ऐसी कि नेताओं का भाषण पिघल गया”

गिरिडीह में बिजली-पानी के मुद्दे पर भाजपाई उपायुक्त कार्यालय पहुंचे तो माहौल पूरा आंदोलनमय था। चेहरे पर बंगाल फतह की चमक और हाथों में झंडा। महिलाएं सिर पर घड़ा लेकर चल रही थीं, युवा नेता गेट पर चढ़कर क्रांति का ट्रेलर दिखा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि अब भाषणों की बरसात होगी और सरकार की बिजली गुल कर दी जाएगी।

लेकिन तभी सूरज देवता ने अपना असली तेवर दिखा दिया। पारा ऊपर और कार्यकर्ताओं का धैर्य नीचे जाने लगा। मंच पर नेताओं की लंबी सूची देखकर समर्थकों के चेहरे ऐसे उतरने लगे जैसे बिना बिजली के इनवर्टर बैठ जाता है। अगुवाई कर रहे नेताओं ने तुरंत राजनीतिक एसी चालू किया और फैसला हुआ कि स्थानीय नेताओं का भाषण बंद। सिर्फ बाहर से आए दो अतिथि ही बोलेंगे।

सो, विधायक डॉ. नीरा यादव और सरोज सिंह ने भाषण दिया, बाकी नेता मन ही मन लोकतंत्र को कोसते रह गए। कई नेता तो माइक को ऐसे देख रहे थे जैसे दूल्हा बारात में दुल्हन को देखता है।

मस्तराम बोले-बंगाल जीतने से जोश आना ठीक है, लेकिन झारखंड की राजनीति में सिर्फ नारा नहीं, पसीना भी बहाना पड़ता है। यहां गर्मी भी परीक्षा लेती है और जनता भी।

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